भगवान कहते हैं:
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
जो भक्त अनन्य भाव से मेरा चिंतन करते हैं और मेरी उपासना करते हैं, उनके योग (जो उनके पास नहीं है, उसे देने) और क्षेम (जो उनके पास है, उसकी रक्षा करने) का दायित्व मैं स्वयं उठाता हूँ
निरंतर ईश्वर का चिंतन करने से दुःख की कोई संभावना नहीं रहती। जब हमारा चिंतन संसार की ओर जाता है, तो हमें क्षणिक सुख मिलता है, लेकिन Power of Meditation का उपयोग करते हुए भगवान का चिंतन किया जाए, तो हमें अखंड आनंद की प्राप्ति होती है।
भगवान कहते हैं कि जो सुख हमें संसार में मिलता है, वह वास्तविक सुख नहीं होता, बल्कि दुख का ही एक रूप होता है। यदि हम विषय-भोगों से विरक्त हो जाएँ, तो दुख नाम की कोई वस्तु नहीं रह जाती।
पूर्णता कर्म से नहीं मिलती, पूर्णता चिंतन से मिलती है। बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट भी संतुष्ट नहीं हुए, लेकिन जिसने भगवान को पा लिया, वह पूर्ण संतुष्ट हो गया। Power of Meditation का सही उपयोग हमें मानसिक शांति और स्थायी सुख की ओर ले जाता है।
Power of Meditation: ईश्वर ही सबसे बड़े दाता हैं व्यक्ति को उचित व्यवसाय या नौकरी करनी चाहिए, लेकिन अत्यधिक लोभ नहीं करना चाहिए। भगवान का नाम “विश्वंभर” (संपूर्ण जगत का पालन करने वाला) है, वे सबको आवश्यकतानुसार देते हैं।
जथा लाभ संतोष सदा, काहू सों कछु न चहौगो।
अतः संतोष ही वास्तविक धन है। भगवान जो भी प्रदान करते हैं, उसमें हमें संतुष्ट रहना चाहिए।
शास्त्र प्रमाणित करते हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं:
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।”
इसलिए, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसका निर्धारण शास्त्रों के अनुसार होना चाहिए। शास्त्रों के द्वारा निर्धारित विधानों को जानकर ही तुम्हें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए
यदि हम शास्त्रों का अध्ययन नहीं कर सकते, तो सत्संग करें। सत्संग से हमें सही और गलत का निर्णय करने की शक्ति मिलती है। जब हम अंतर्मुखी होते हैं, तो भीतर से एक आवाज आती है कि कौन सा कार्य सही है और कौन सा गलत।
यदि हम लोभ, वासना, और भोग-वृत्ति के वशीभूत हो जाएँ, तो वही हमें पाप कर्म की ओर धकेलते हैं। लेकिन Power of Meditation का सही उपयोग हमें मोक्ष और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।