Illustration of Yogini Ekadashi Vrat Katha showing Kubera cursing Hemamali and Sage Markandeya guiding him to observe Yogini Ekadashi for redemption and freedom from suffering.
Table of Contents
Toggleमहत्व, हेममाली-कुबेर की संपूर्ण कथा और पूजा विधि — पद्मपुराण के अनुसार सरल हिन्दी में
सनातन धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की सबसे प्रिय तिथि माना गया है, और वर्षभर की चौबीस एकादशियों में Yogini Ekadashi का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष में पड़ने वाली यह एकादशी न केवल शारीरिक रोगों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती है, बल्कि यह हमें सेवा में प्रमाद न करने की गहरी शिक्षा भी देती है। इस लेख में हम पद्मपुराण के आधार पर Yogini Ekadashi Ki Katha को सरल और सहज हिन्दी में विस्तार से समझेंगे, साथ ही जानेंगे कि Yogini Ekadashi Ka Mahatva क्या है और इसका व्रत विधिपूर्वक कैसे किया जाए।
यह लेख पद्मपुराण के मूल हिन्दी अनुवाद पर आधारित है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच हुए संवाद को यथावत आधार बनाकर सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है, ताकि प्रत्येक पाठक इस कथा के मूल भाव, संवाद और शिक्षा को बिना किसी हेर-फेर के समझ सके।
आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष में आने वाली एकादशी को "योगिनी एकादशी" कहा जाता है। यह ज्येष्ठ मास की निर्जला एकादशी के बाद और आषाढ़ शुक्लपक्ष की देवशयनी एकादशी से पहले पड़ती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने और भगवान विष्णु की आराधना करने से मनुष्य के बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे रोग-मुक्त, सुखी जीवन प्राप्त होता है।
स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस एकादशी की महिमा सुनाते हुए इसे "तीनों लोकों में सारभूत व्रत" कहा है — अर्थात यह संसार के समस्त व्रतों में सबसे श्रेष्ठ और सारगर्भित है।
हिन्दू पंचांग में प्रत्येक माह दो एकादशियाँ आती हैं — एक शुक्लपक्ष में और एक कृष्णपक्ष में। योगिनी एकादशी वर्ष की चौबीस (और अधिकमास होने पर छब्बीस) एकादशियों में से एक है। इसी कारण यह चातुर्मास-काल के आरम्भ से पूर्व आत्म-शुद्धि और तप की अंतिम तैयारी का भी प्रतीक मानी जाती है। भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण इस दिन श्रीहरि की पूजा, तुलसी-अर्चन और विष्णु-सहस्रनाम के पाठ की विशेष महिमा बताई गई है।
चूँकि एकादशी तिथि पंचांग और चंद्रमा की गति पर आधारित होती है, इसलिए हर वर्ष इसकी तिथि बदलती रहती है। वर्ष 2026 में योगिनी एकादशी तिथि 10 जुलाई (शुक्रवार) को प्रातः लगभग 8:16 बजे से आरम्भ होकर 11 जुलाई को प्रातः लगभग 5:22 बजे तक रही, तथा व्रत का पारण 11 जुलाई को दोपहर के समय (लगभग 1:50 से 4:42 बजे के बीच) किया गया।
चूँकि प्रत्येक वर्ष तिथि और समय में परिवर्तन होता है, इसलिए भावी वर्षों के लिए सटीक मुहूर्त हेतु अपने स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।
पद्मपुराण के अनुसार जब राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम और महत्व पूछा, तो भगवान ने उत्तर दिया कि इसका नाम "योगिनी" है और यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है।
श्रीकृष्ण ने इसकी तुलना एक ऐसी नौका से की है, जो संसार-सागर में डूबते हुए प्राणियों को पार लगाती है। यही कारण है कि इसे तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ और सारभूत व्रत कहा गया है।
इस एकादशी की महिमा इतनी अधिक है कि इसे विधिपूर्वक करने वाले व्यक्ति को अठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य-फल प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, इस कथा के पढ़ने और सुनने मात्र से भी मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है — यही Yogini Ekadashi Ka Mahatva है।
इस व्रत की एक और विशेषता यह है कि इसे स्वास्थ्य से जुड़ी कठिनाइयों, विशेषकर चर्म रोगों और त्वचा संबंधी विकारों से पीड़ित साधकों के लिए विशेष रूप से फलदायी माना गया है — जिसके स्वयं हेममाली इस कथा में जीवंत उदाहरण हैं।
योगिनी एकादशी, देवशयनी एकादशी से ठीक पहले आती है, और देवशयनी एकादशी से ही भगवान विष्णु के शयन काल यानी चातुर्मास का प्रारम्भ माना जाता है। जो साधक आने वाले चार मासों में व्रत, संयम और सेवा का संकल्प लेना चाहते हैं, उनके लिए योगिनी एकादशी एक उपयुक्त प्रारम्भ-बिंदु मानी जाती है।
कथा को भली-भाँति समझने के लिए पहले इसमें आने वाले प्रमुख पात्रों को जान लेना उपयोगी रहेगा —
महाभारत काल में एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से जिज्ञासावश पूछा — "हे वासुदेव! आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम क्या है और उसकी महिमा क्या है? कृपया मुझे विस्तार से बताइए।" भगवान श्रीकृष्ण ने बड़े प्रेम से उत्तर देना आरम्भ किया, और इसी संवाद से पूरी Yogini Ekadashi Vrat Katha का प्रारम्भ होता है।
अलकापुरी नामक नगरी में यक्षराज कुबेर निवास करते थे। कुबेर स्वभाव से भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन नियमपूर्वक उनकी पूजा-अर्चना किया करते थे। उनकी सेवा में एक यक्ष कार्यरत था, जिसका नाम हेममाली था। हेममाली का दायित्व यह था कि वह प्रतिदिन मानसरोवर से सुंदर पुष्प लाकर कुबेर को शिव-पूजा के लिए भेंट करे।
हेममाली की पत्नी अत्यंत सुंदर थी, जिसका नाम विशालाक्षी था। कुबेर का क्रोध व्यक्तिगत द्वेष से नहीं, बल्कि सेवा-धर्म के प्रति उनकी गहरी निष्ठा से उपजा था।
एक दिन की बात है — हेममाली मानसरोवर से पुष्प लेकर लौटा, परन्तु वह सीधे कुबेर के पास न जाकर अपने घर पर ही रुक गया। पत्नी विशालाक्षी के साथ प्रेम-विनोद में इतना डूब गया कि उसे समय का भान ही नहीं रहा। उधर कुबेर मध्याह्न तक शिव-पूजा के लिए पुष्पों की प्रतीक्षा करते रहे। जब पूजा का समय बीत गया, तो उन्होंने क्रोधित होकर सेवकों से पूछा कि हेममाली अब तक क्यों नहीं आया।
यह सुनते ही कुबेर क्रोध से भर उठे और उन्होंने तुरन्त हेममाली को अपने सामने बुलवाया। जब वह कुबेर के सम्मुख उपस्थित हुआ, तो कुबेर ने अत्यंत क्रोधित स्वर में कहा —
हे पापी! हे दुष्ट! हे दुराचारी! तूने भगवान की सेवा की अवहेलना की है। अतः तू कोढ़ रोग से ग्रस्त होकर अपनी प्रियतमा से सदा के लिए वियुक्त हो जा, और इस स्थान से भ्रष्ट होकर कहीं और चला जा।
इस शाप के फलस्वरूप हेममाली तत्क्षण अलकापुरी से नीचे गिर पड़ा। उसका सम्पूर्ण शरीर कोढ़ से पीड़ित हो गया, और वह अपनी प्रिय पत्नी से सदा के लिए बिछुड़ गया। परन्तु पूर्वजन्म की शिव-भक्ति के प्रभाव से उसकी स्मरण-शक्ति नष्ट नहीं हुई।
शाप से पीड़ित हेममाली इधर-उधर भटकता हुआ मेरु पर्वत के शिखर पर जा पहुँचा। वहाँ उसे महर्षि मार्कण्डेय के दर्शन हुए। मुनि ने परोपकार की भावना से पूछा — "तुम्हें कोढ़ के रोग ने इस प्रकार क्यों जकड़ लिया?" हेममाली ने विनम्रतापूर्वक अपनी पूरी कथा सत्य-सत्य कह सुनाई — अपना परिचय, हुआ प्रमाद, और मिला भीषण शाप।
यह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है — शरीर रोग से गल रहा था, फिर भी उसने अपनी भूल छिपाने के बजाय पूरी सच्चाई स्वीकार की। यही निष्कपट स्वीकारोक्ति उसके उद्धार की पहली सीढ़ी बनी।
हेममाली की सच्ची बात सुनकर मार्कण्डेय ऋषि प्रसन्न हुए और बोले — "तुमने यहाँ सत्य वचन कहे हैं। इसलिए मैं तुम्हें एक ऐसे कल्याणकारी व्रत का उपदेश देता हूँ, जिससे तुम्हारा कल्याण अवश्य होगा।" ऋषि ने उसे आषाढ़ कृष्णपक्ष की "योगिनी एकादशी" का व्रत विधिपूर्वक करने का आदेश दिया।
हेममाली अत्यंत हर्षित हुआ और दंडवत होकर मुनि के चरणों में गिर पड़ा। तत्पश्चात उसने श्रद्धा और नियमपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसकी भयंकर कोढ़ पूर्णतः समाप्त हो गई। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करता है, उसे अठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्य प्राप्त होता है।
Yogini Ekadashi Vrat Katha केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जीवन जीने की गहरी शिक्षा भी है। इस कथा से हमें निम्नलिखित सीखें मिलती हैं —
हेममाली का पतन उसकी अनास्था से नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य में हुई एक क्षणिक असावधानी से हुआ। सांसारिक सुखों में डूबकर हमें अपने दायित्वों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
हेममाली ने मार्कण्डेय ऋषि के सामने अपनी गलती को बिना छिपाए स्वीकार किया। सत्य-भाषण से बड़े से बड़ा संकट भी टल सकता है।
दुःख और रोग से पीड़ित हेममाली को जब एक महान ऋषि का सत्संग प्राप्त हुआ, तभी उसके जीवन में परिवर्तन आया।
कोई भी गलती अंतिम नहीं होती। सच्चे मन से पश्चाताप करने से सबसे बड़े पाप का भी प्रायश्चित संभव है।
श्रद्धापूर्वक किया गया एकादशी व्रत आत्मिक शुद्धि के साथ-साथ शारीरिक रोगों के निवारण में भी सहायक होता है।
यद्यपि पद्मपुराण की मूल कथा व्रत के फल और महिमा पर केंद्रित है, परंतु एकादशी व्रत की सामान्य परंपरा के अनुसार इसे निम्न प्रकार से किया जाता है —
पूरे दिन केवल जल ग्रहण कर व्रत रखना — सबसे कठिन प्रकार।
दूध व दुग्ध-पदार्थों का सेवन करते हुए व्रत।
केवल फलों का सेवन — केला, अंगूर, आम, बादाम आदि।
सूर्यास्त-पूर्व अन्न-रहित एक समय का भोजन।
व्रत का संकल्प और मंत्रोच्चारण अपने कुल-परम्परा तथा गुरु के मार्गदर्शन अनुसार ही करना उचित होता है। किसी विशेष मंत्र हेतु अपने पारिवारिक पुरोहित या गुरु से परामर्श अवश्य लें।
पद्मपुराण में वर्णित इस कथा के आधार पर योगिनी एकादशी व्रत के अनेक आध्यात्मिक और सांसारिक लाभ बताए गए हैं —
एकादशी व्रत का फल तभी पूर्ण होता है जब बाहरी अनुष्ठान के साथ-साथ मन और वाणी की शुद्धता भी बनी रहे।
सात्विक आचरण, सदा सत्य बोलना, भगवद्भक्ति और नाम-स्मरण, यथाशक्ति दान-पुण्य, तुलसी-पूजन, शास्त्र-कथा श्रवण।
क्रोध, असत्य वचन, तामसिक भोजन, दिन में अनावश्यक निद्रा, किसी की निंदा या अपमान, अन्न-प्रधान वस्तुओं का सेवन।
हेममाली की कथा हमें यही सिखाती है कि केवल बाहरी नियमों का पालन पर्याप्त नहीं — भीतर से सेवा-भाव, सत्यनिष्ठा और विनम्रता का होना भी उतना ही आवश्यक है।
आज के व्यस्त जीवन में भी हेममाली की कथा हमें दर्पण की तरह अपना प्रतिबिंब दिखाती है। हम अक्सर पारिवारिक सुख, कार्य के दबाव या निजी व्यस्तताओं में इतने डूब जाते हैं कि अपने कर्तव्यों के प्रति असावधान हो जाते हैं।
यह कथा हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में जब भी कोई कठिन दौर आए — तो निराश होने के बजाय सत्संग, आत्म-चिंतन और भक्ति का मार्ग अपनाना चाहिए, ठीक जैसे हेममाली को मार्कण्डेय ऋषि का मार्गदर्शन मिला।
Yogini Ekadashi Vrat Katha हमें यह सिखाती है कि चाहे हम कितनी भी बड़ी भूल क्यों न कर बैठें, सच्चे मन से पश्चाताप, सत्संग और श्रद्धापूर्ण व्रत-साधना से जीवन की सबसे कठिन विपत्ति भी दूर हो सकती है। इस पावन एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से भगवान श्रीहरि की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।
योगिनी एकादशी प्रतिवर्ष आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है, जो सामान्यतः जून या जुलाई माह में पड़ती है।
यह कथा भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी, जो पद्मपुराण में वर्णित है।
इस व्रत से पापों का नाश, मन की शुद्धि और शारीरिक रोगों विशेषकर चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है। इसे अठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान पुण्यदायी बताया गया है।
हेममाली अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ प्रेम-विनोद में इतना लीन हो गया कि वह कुबेर की शिव-पूजा के लिए पुष्प समय पर नहीं पहुँचा सका, जिससे कुबेर ने क्रोधित होकर उसे कोढ़ और पत्नी-वियोग का शाप दिया।
मेरु पर्वत पर महर्षि मार्कण्डेय के उपदेश से हेममाली ने योगिनी एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक किया, जिसके प्रभाव से उसकी कोढ़ पूर्णतः समाप्त हो गई।
नहीं, व्रत अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार निर्जल, फलाहार अथवा एक समय के भोजन के रूप में किया जा सकता है। मुख्य बात है श्रद्धा और नियम का पालन।
वर्ष 2026 में एकादशी तिथि 10 जुलाई को प्रारम्भ होकर 11 जुलाई तक रही। सटीक तिथि प्रत्येक वर्ष बदलती है, अतः वर्तमान वर्ष की तिथि हेतु पंचांग अवश्य देखें।
शास्त्रों के अनुसार इस कथा को पढ़ने या सुनने मात्र से भी मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
योगिनी एकादशी, देवशयनी एकादशी से ठीक पहले आती है। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु के शयन-काल यानी चातुर्मास का आरम्भ माना जाता है।
हाँ, इस दिन यथाशक्ति अन्न, वस्त्र या धन का दान करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। दान और सेवा को इस व्रत का अभिन्न अंग माना जाता है।
योगिनी एकादशी व्रत कथा का वीडियो देखें। Click here- YouTube
दैनिक सनातन धर्म की प्रेरणादायक रील्स देखें। Click here- Instagram
Devshayani Ekadashi Vrat Katha in Hindi | देवशयनी एकादशी व्रत कथा, महत्व और नियम 🪷…
भगवान जगन्नाथ की संपूर्ण कथा और रथ यात्रा रहस्य | Jagannath Rath Yatra Full Story…
Durga Devi Temple Kotdwar | दुर्गा देवी मंदिर कोटद्वार-दुगड्डा मार्ग की संपूर्ण कथा और यात्रा…
Somvati Amavasya: महत्व, पूजा विधि, कथा और उपाय | Complete Guide मुख्य सामग्री पर जाएं…
Parama Ekadashi 2025 | Parama Ekadashi Vrat Katha in Hindi | Purushottam Month ✦ Purushottam…
Shri Harivansh Mahaprabhu | Radha Vallabh Shri Harivansh | Vrindavan Sant Parichay Shri Harivansh Mahaprabhu…
View Comments
जय श्री कृष्ण राधे राधे 🙏🏻🙏🏻
राधे राधे