एकादशी 2026

Nirjala Ekadashi: सबसे कठिन व्रत की कथा और विधि

निर्जला एकादशी व्रत कथा, महत्व और विधि | Nirjala Ekadashi Vrat Vidhi
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष • एकादशी विशेष

निर्जला एकादशी व्रत कथा, महत्व और सम्पूर्ण विधि

Nirjala Ekadashi — वर्षभर की समस्त एकादशियों का फल देने वाला परम पुनीत व्रत, जिसे महाबली भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास के निर्देशन में सबसे पहले ग्रहण किया था।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

ज्येष्ठ मास की गर्मी जब अपने चरम पर होती है, उसी समय शुक्ल पक्ष की एकादशी को सम्पूर्ण भारतवर्ष में Nirjala Ekadashi का व्रत श्रद्धा और संकल्प के साथ मनाया जाता है। यह व्रत केवल एक उपवास नहीं, बल्कि संयम, श्रद्धा और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण की सबसे कठिन परीक्षा है।

1निर्जला एकादशी क्या है?

निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को कहा जाता है। इसका नाम ही इसकी कठिनता बताता है — "निर्जल" अर्थात जल के बिना। इस दिन व्रती को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक अन्न तो दूर, जल की एक बूँद भी ग्रहण नहीं करनी होती। केवल कुल्ला या आचमन के लिए ही मुख में जल लिया जा सकता है।

चूँकि ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष अथवा मिथुन राशि पर होता है और गर्मी अपने चरम पर रहती है, इसलिए इस व्रत को वर्ष की सभी एकादशियों में सबसे कठिन और सबसे अधिक फलदायी माना गया है। इसी कारण इसे श्रद्धालु समाज में अत्यंत आदर और भक्ति-भाव के साथ मनाया जाता है।

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2निर्जला एकादशी व्रत कथा

पद्म पुराण में वर्णित यह Nirjala Ekadashi Vrat Katha महाभारत के पाण्डवों से जुड़ी है। आइए, इस प्रसंग को क्रमशः समझते हैं।

युधिष्ठिर का प्रश्न और भगवान कृष्ण का उत्तर

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि अमावस्या का माहात्म्य सुनने के पश्चात अब वे ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का वर्णन सुनना चाहते हैं। इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इस व्रत का वर्णन स्वयं सत्यवतीनन्दन महर्षि वेदव्यास करेंगे, क्योंकि वे समस्त शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद-वेदांगों के पारदर्शी विद्वान हैं।

भीमसेन की व्यथा

तब महर्षि वेदव्यास ने बताया कि एकादशी के दिन भोजन नहीं करना चाहिए, और द्वादशी को स्नान आदि से पवित्र होकर भगवान केशव का पूजन करने के बाद, पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर फिर स्वयं भोजन करना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जन्म और मृत्यु के अशौच में भी एकादशी को भोजन वर्जित है।

यह सुनकर महाबली भीमसेन ने अत्यंत विनम्रता से अपनी कठिनाई बताई। उन्होंने कहा कि राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव — ये सभी कभी एकादशी को भोजन नहीं करते और उन्हें भी सदा यही समझाते रहते हैं, परन्तु भीमसेन हर बार यही उत्तर देते थे कि उनसे भूख सही नहीं जाती।

"भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो।" — युधिष्ठिर, कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल व सहदेव सभी भीमसेन को यही समझाते थे, परन्तु भीमसेन हर बार यही कहते — "मुझसे भूख नहीं सही जायगी।"

वेदव्यासजी का परामर्श

भीमसेन की यह बात सुनकर वेदव्यासजी ने कहा — "यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो, तो दोनों पक्षों की एकादशी को भोजन न करना।" इस पर भीमसेन ने अत्यंत सच्चाई और विनम्रता से अपनी असमर्थता स्वीकार की।

"महाबुद्धिमान् पितामह ! मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूँ — एक बार भोजन करके भी मुझसे व्रत नहीं किया जा सकता। फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूँ। मेरे उदर में 'बृक' नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है; अतः जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शान्त होती है। इसलिये महामुने ! मैं वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ; जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करूँगा।" — भीमसेन

भीमसेन की इस विनती को सुनकर ही महर्षि वेदव्यास ने उन्हें वर्षभर में केवल एक बार आने वाले इस परम पुनीत निर्जला एकादशी व्रत का विधान बताया, जिससे उनकी समस्या का भी समाधान हो सके और वे स्वर्गलोक के अधिकारी भी बन सकें।

तब महर्षि वेदव्यास ने भीमसेन को बताया कि ज्येष्ठ मास में, जब सूर्य वृष या मिथुन राशि पर हो, शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि वर्षभर की जितनी भी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका सम्पूर्ण फल इस एक निर्जला एकादशी के पालन से प्राप्त हो जाता है — इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

वेदव्यासजी ने आगे यह भी स्मरण कराया कि शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान केशव ने स्वयं कहा था कि जो मानव सबकुछ छोड़कर एकमात्र उनकी शरण में आ जाए और एकादशी को निराहार रहे, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

व्रत का प्रारम्भ — पाण्डव द्वादशी

यह सुनकर भीमसेन ने श्रद्धापूर्वक इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तभी से यह व्रत लोक में "पाण्डव द्वादशी" और भीमसेनी एकादशी के नाम से भी विख्यात हुआ।

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3निर्जला एकादशी व्रत विधि

शास्त्रों में वर्णित Nirjala Ekadashi Vrat Vidhi का पालन करने से व्रत का सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है। नीचे क्रमवार विधि दी गई है, जिसका पालन श्रद्धापूर्वक करना चाहिए।

🪔 क्रमवार व्रत विधि

  1. एकादशी से एक दिन पूर्व अर्थात दशमी को सात्त्विक एवं संयमित भोजन करें, ताकि शरीर अगले दिन के व्रत हेतु तैयार हो सके।
  2. एकादशी के दिन प्रातः दन्तधावन करने के पश्चात यह संकल्प लें कि "मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के अतिरिक्त जल का भी त्याग करूँगा।"
  3. सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक अन्न और जल दोनों का पूर्ण त्याग करें।
  4. दिनभर भगवान विष्णु के नाम-स्मरण, भजन-कीर्तन और सत्संग में मन लगाएँ।
  5. रात्रि में जागरण करते हुए श्रीहरि की भक्तिपूर्वक आराधना करें।
  6. द्वादशी के निर्मल प्रभातकाल में स्नान करके भगवान विष्णु का विधिपूर्वक पूजन करें।
  7. ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और स्वर्ण का दान दें, तत्पश्चात उन्हें भोजन कराएँ।
  8. अंत में, ब्राह्मण-भोजन के बाद ही जितेन्द्रिय भाव से स्वयं भोजन ग्रहण करें।

4उपवास के नियम

Nirjala Ekadashi Fasting Rules अत्यंत कठोर माने गए हैं, क्योंकि यह वर्षभर के सभी व्रतों में सबसे श्रेष्ठ फल देने वाला व्रत है। इन नियमों का पालन करना व्रत की सफलता के लिए अनिवार्य बताया गया है।

📿 ध्यान रखने योग्य नियम

  • सूर्योदय से दूसरे दिन सूर्योदय तक किसी भी रूप में जल ग्रहण न करें — केवल कुल्ला या आचमन की अनुमति है।
  • जन्म या मृत्यु के अशौच (सूतक) में भी यह नियम लागू होता है — एकादशी को भोजन नहीं किया जाता।
  • व्रत को बीच में तोड़ना अथवा भूलवश जल ग्रहण कर लेना व्रत-भंग माना जाता है, इसलिए सतर्कता आवश्यक है।
  • द्वादशी को स्नान और पूजन से पूर्व भोजन ग्रहण न करें।
  • मन, वचन और कर्म से संयम रखते हुए दिनभर सात्त्विक विचारों में लीन रहें।

शास्त्र यह भी कहते हैं कि जो मनुष्य इस दिन अन्न ग्रहण करता है, वह पाप-भोजन करता है और इस लोक में चाण्डाल के समान माना जाता है, तथा मृत्यु के पश्चात दुर्गति को प्राप्त होता है। इसीलिए श्रद्धालु इस नियम का अत्यंत सावधानी से पालन करते हैं।

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5द्वादशी पूजन एवं मंत्र-विधान

द्वादशी के दिन देवदेवेश्वर भगवान विष्णु का गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। पूजन के समय जल से भरे कलश का संकल्प करते हुए शास्त्रों में एक विशेष श्लोक का उल्लेख मिलता है, जो इस अवसर की भावना को दर्शाता है:

देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक ।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम् ॥ अर्थ: "हे संसार-सागर से तारने वाले देवदेव हृषीकेश! इस जल के घड़े के दान से आप मुझे परम गति प्रदान करें।"
🙏 परम्परा के अनुसार यह संकल्प-मंत्र पूजन के समय विधिपूर्वक उच्चारित किया जाता है। इसका सही उच्चारण, संकल्प-विधि और अनुष्ठान-क्रम किसी विद्वान पुरोहित अथवा अपने गुरु के मार्गदर्शन में सीखना उचित माना जाता है, जिससे पूजन सम्पूर्ण फलदायी हो सके।

6दान का महत्व और दान-सामग्री

निर्जला एकादशी पर दान का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन करके जलमयी धेनु या घृतमयी धेनु का दान करना श्रेष्ठ माना गया है। पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ट अन्न द्वारा ब्राह्मणों को संतुष्ट करना चाहिए, क्योंकि उनके संतुष्ट होने पर ही श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं।

जल सम्बन्धी दानजल से भरा कलश, सत्तू, छाता, कमण्डलु
वस्त्र व उपयोग की वस्तुएँवस्त्र, शय्या, सुन्दर आसन, जूते
अन्न व गौ-दानअन्न, गौ-दान, घृतमयी धेनु
स्वर्ण व दक्षिणाब्राह्मणों को स्वर्ण व यथोचित दक्षिणा

जो श्रेष्ठ एवं सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, उसके विषय में कहा गया है कि वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। यह दर्शाता है कि इस दिन का दान कितना महत्वपूर्ण माना गया है।

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7व्रत के लाभ और महिमा

शास्त्रों में निर्जला एकादशी की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। आइए इसके प्रमुख फलों को जानें।

✨ व्रत से प्राप्त होने वाले फल

  • वर्षभर में आने वाली समस्त एकादशियों का संयुक्त फल इस एक व्रत से प्राप्त हो जाता है।
  • स्त्री या पुरुष ने यदि मेरु पर्वत के समान भी महान पाप किया हो, तो वह सब इस एकादशी के प्रभाव से भस्म हो जाता है।
  • जो जल के नियम का पालन करता है, उसे प्रत्येक पहर में करोड़ों स्वर्णमुद्रा दान करने के समान फल प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है।
  • इस दिन किया गया स्नान, दान, जप और होम — सब कुछ अक्षय फल देने वाला माना गया है।
  • ब्रह्महत्या, मद्यपान, चोरी अथवा गुरु-द्रोह जैसे पाप करने वाले भी इस व्रत के पालन से समस्त पातकों से मुक्त हो जाते हैं।
  • जो शम, दम और दान में प्रवृत्त होकर श्रीहरि की पूजा और रात्रि-जागरण के साथ यह व्रत करता है, वह अपनी विगत सौ पीढ़ियों और आने वाली सौ पीढ़ियों को भी भगवान वासुदेव के परम धाम तक पहुँचा देता है।

इस व्रत के विषय में एक अत्यंत भावपूर्ण तुलना शास्त्रों में मिलती है — एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंग वाले दण्ड-पाशधारी भयंकर यमदूत कभी नहीं जाते। इसके विपरीत, अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आकर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं।

⚖️ दो प्रकार के दूत — शास्त्रों का वर्णन

यमदूत (व्रत न करने वालों हेतु)विशालकाय, विकराल आकृति, काले रंग के, हाथ में दण्ड-पाश धारण करने वाले, अत्यंत भयंकर
विष्णुदूत (व्रती हेतु)पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव, हाथ में सुदर्शन चक्र, मन के समान वेगशाली

इसी कारण शास्त्र कहते हैं कि निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न के साथ उपवास करना चाहिए, ताकि स्त्री-पुरुष दोनों समस्त पापों की शान्ति प्राप्त कर सकें। जो ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष में एकादशी को उपवास करके यथाशक्ति दान भी देते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करने वाला मानव वैष्णव-पद को प्राप्त कर लेता है, और जो इस प्रकार पूर्णरूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर अनामय पद (निरोग, अक्षय पद) को प्राप्त होता है।

इस कथा का एक और सुन्दर प्रसंग यह भी है कि भगवान वेदव्यास ने भीमसेन को विशेष रूप से कहा कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की इस शुभ एकादशी पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल से भरे घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है।

इतना ही नहीं, इस एकादशी की महिमा को सुनने का फल भी अत्यंत विशिष्ट बताया गया है — चतुर्दशी-युक्त अमावास्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करने से मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इस कथा के श्रद्धापूर्वक श्रवण से भी प्राप्त होता है। साथ ही, जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता है तथा जो भक्तिपूर्वक उसका वर्णन करता है, वे दोनों ही स्वर्गलोक में जाते हैं।

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8अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

निर्जला एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं क्या?

नहीं। इस व्रत में जल का पूर्ण त्याग किया जाता है। केवल कुल्ला या आचमन के लिए ही मुख में जल लिया जा सकता है, इसके अतिरिक्त किसी भी रूप में जल ग्रहण करना वर्जित माना गया है।

निर्जला एकादशी व्रत कब समाप्त होता है?

एकादशी के सूर्योदय से प्रारम्भ हुआ यह व्रत द्वादशी तिथि के सूर्योदय के पश्चात स्नान और भगवान विष्णु के पूजन के बाद ही पूर्ण माना जाता है।

निर्जला एकादशी व्रत क्यों किया जाता है?

शास्त्रों के अनुसार इस एक व्रत के पालन से वर्षभर की समस्त चौबीस एकादशियों के व्रत के समान फल प्राप्त होता है, इसलिए श्रद्धालु इसे विशेष भक्ति-भाव से करते हैं।

निर्जला एकादशी को पाण्डव एकादशी क्यों कहते हैं?

महर्षि वेदव्यास के परामर्श पर यह व्रत सबसे पहले महाबली भीमसेन ने ग्रहण किया था, इसी कारण इसे "पाण्डव द्वादशी" अथवा भीमसेनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।

निर्जला एकादशी पर क्या दान करना चाहिए?

इस दिन जल से भरा कलश, सत्तू, छाता, वस्त्र, अन्न, गौ-दान, शय्या, आसन और कमण्डलु जैसी वस्तुओं का दान शुभ माना गया है। साथ ही ब्राह्मणों को भोजन व दक्षिणा देना भी आवश्यक बताया गया है।

क्या निर्जला एकादशी व्रत सभी के लिए अनिवार्य है?

यह व्रत श्रद्धा और शारीरिक क्षमता पर आधारित है। जो लोग वर्षभर सभी एकादशियों का व्रत नहीं कर सकते, उनके लिए विशेष रूप से इस एक व्रत को पर्याप्त माना गया है। स्वास्थ्य सम्बन्धी किसी भी निर्णय से पूर्व अपने गुरु या वरिष्ठजनों से परामर्श लेना उचित रहता है।

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9निष्कर्ष

निर्जला एकादशी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि संयम, श्रद्धा और समर्पण की वह परीक्षा है जिसे स्वयं महाबली भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास के मार्गदर्शन में स्वीकार किया था। यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के प्रति सच्ची भक्ति और दृढ़ संकल्प से कोई भी कठिन व्रत सहज हो जाता है। यदि आप वर्षभर एकादशी व्रत नहीं कर पाते, तो शास्त्रों के अनुसार केवल इस एक निर्जला एकादशी के विधिपूर्वक पालन से ही समस्त एकादशियों का फल प्राप्त किया जा सकता है।

व्रत, पूजन-विधि अथवा मंत्र-उच्चारण से सम्बन्धित किसी भी शंका के लिए अपने गुरु अथवा विद्वान पुरोहित से परामर्श अवश्य लें, जिससे यह पुनीत व्रत सम्पूर्ण श्रद्धा और शुद्धता के साथ सम्पन्न हो सके।

🙏 हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ॥
स्रोत संदर्भ: पद्म पुराण

आपने ऊपर निर्जला एकादशी की कथा पढ़ी। अब इस कथा को सुंदर वीडियो रूप में देखने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

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Venu Sharan

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