हमारे जन्म-जन्मांतर के संचित कर्मों का विशाल भंडार है। इनमें से कुछ कर्म Prarabdh (प्रारब्ध) के रूप में हमारे वर्तमान जीवन में सुख-दुःख के रूप में आते हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे अनाज के भंडार से कुछ मात्रा में गेहूं निकालकर उपयोग किया जाता है।
संचित कर्मों को जलाने के लिए हमें नए कर्म करने होंगे, और इसके लिए सबसे श्रेष्ठ उपाय है भजन। भजन (Devotional Practices) और सत्कर्म के माध्यम से ही संचित कर्मों का नाश किया जा सकता है। इसके अलावा कोई अन्य तरीका नहीं है।
दान, तीर्थयात्रा, आदि सभी शुभ कर्मों में आते हैं, लेकिन जो निरंतर नाम जपते हैं – “राधा राधा”, “कृष्ण कृष्ण”, “राम राम”, “हरि हरि “, “शिव शिव” – उनके संचित कर्म शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। यदि हम दूसरों का कल्याण मानवीय दृष्टि से करते हैं, तो यह पुण्य बनता है, लेकिन यदि यह कार्य भगवान की भक्ति भाव से किया जाए, तो यह कर्म संस्कारों को नष्ट कर देता है।
यदि हम पढ़ाई को भगवान की पूजा समझकर समर्पित करें, तो यह पूजा बन जाती है। लेकिन यदि हम पूजा धन कमाने के लिए करें, तो वह पूजा नहीं मानी जाएगी। इसी प्रकार, यदि किसान खेती को भगवान को अर्पित करके करता है, तो उसका कार्य भी पूजा बन जाता है।
महत्वपूर्ण यह नहीं कि हम क्या कर रहे हैं, बल्कि यह कि हमारा उद्देश्य क्या है। उद्देश्य से ही कर्म की महानता या नीचता तय होती है। यदि उद्देश्य महान है, तो कर्म भी महान होगा, और यदि उद्देश्य नीच है, तो महान कर्म भी नीच बन जाएगा। विद्यार्थी, डॉक्टर, शिक्षक, किसान – सभी को अपने कर्तव्य कर्म में लगे रहना चाहिए, क्योंकि यही ईश्वर का आदेश है
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि।।” (गीता 2.38)
अर्थात, सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर कर्म करो, इससे पाप नहीं लगेगा।