वसिष्ठ जी ने कहा, “महाभाग! सुनो, पृथ्वी पर ‘आमलकी’ की उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह बताता हूँ। आमलकी एक महान वृक्ष है, जो सब पापों का नाश करने वाला है। एक समय भगवान विष्णु के थूकने पर उनके मुख से चन्द्रमा के समान कान्तिमान एक बिंदु प्रकट हुआ। वह बिंदु पृथ्वी पर गिरा और उसी से आमलकी (आँवले) का महान वृक्ष उत्पन्न हुआ। यह सभी वृक्षों का आदिभूत कहलाता है।
इसी समय, समस्त प्रजा की सृष्टि करने के लिए भगवान ने ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया। ब्रह्मा जी ने देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा महर्षियों को जन्म दिया। उनमें से देवता और ऋषि उस स्थान पर आए जहाँ विष्णुप्रिया आमलकी का वृक्ष था। उस अनोखे वृक्ष को देखकर सभी को बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे कि पूर्व कल्प के सभी वृक्ष तो हमें ज्ञात हैं, किन्तु इस वृक्ष को हम नहीं पहचानते।
आकाशवाणी और आमलकी की महिमा:
उन्हें इस प्रकार चिंतित देख आकाशवाणी हुई: ‘महर्षियो! यह सर्वश्रेष्ठ आमलकी का वृक्ष है, जो विष्णु को प्रिय है। इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल मिलता है। स्पर्श करने से दोगुना और फल भक्षण करने से तिगुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए सदा प्रयत्नपूर्वक आमलकी का सेवन करना चाहिए। यह सब पापों को हरने वाला वैष्णव वृक्ष है। इसके मूल में विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्ध (तने) में भगवान रुद्र, शाखाओं में मुनि, टहनियों में देवता, पत्तों में वसु, फूलों में मरुद्गण तथा फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं। आमलकी सर्वदेवमयी है। अतः विष्णु भक्त पुरुषों के लिए यह परम पूज्य है।’
भगवान विष्णु का प्राकट्य और व्रत का वरदान:
यह सुनकर ऋषियों ने आकाशवाणी से पूछा, “आप कौन हैं? हम आपको क्या समझें?” तब आकाशवाणी हुई, “सम्पूर्ण भूतों के कर्ता, समस्त भुवनों के स्रष्टा, वही सनातन विष्णु मैं हूँ।” यह सुनकर महर्षियों के नेत्र आश्चर्य से चकित हो गए और वे भगवान की स्तुति करने लगे:
“सम्पूर्ण भूतों के आत्मभूत, आत्मा एवं परमात्मा को नमस्कार है। अच्युत को नित्य प्रणाम है। दामोदर, कवि और यज्ञेश्वर को नमस्कार है। मायापते! आपको प्रणाम है।”
स्तुति से संतुष्ट होकर भगवान श्रीहरि ने कहा, “महर्षियो! तुम्हें कौन-सा अभीष्ट वरदान दूँ?” ऋषि बोले, “भगवन्! यदि आप संतुष्ट हैं तो हमारे हित के लिए कोई ऐसा व्रत बताइए, जो स्वर्ग और मोक्ष रूपी फल प्रदान करने वाला हो।”
तब भगवान विष्णु ने कहा, “महर्षियो! फाल्गुन शुक्ल पक्ष में यदि पुष्य नक्षत्र से युक्त द्वादशी हो तो वह महान पुण्य देने वाली और पातकों का नाश करने वाली होती है। Amalaki Ekadashi के दिन आँवले के वृक्ष के पास जाकर वहाँ रात्रि में जागरण करना चाहिए। इससे मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और हजार गोदान का फल प्राप्त करता है। यह व्रतों में उत्तम व्रत है।”