हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसे Jaya Ekadashi के नाम से जाना जाता है। यह तिथि अत्यंत पवित्र और सभी पापों का नाश करने वाली मानी गई है। शास्त्रों में कहा गया है कि यह सब पापों को हरनेवाली उत्तम तिथि है | पवित्र होनेके साथ ही पापोंका नाश करनेवाली है तथा मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करती है। इसका महत्व इतना अधिक है कि यह ब्रह्महत्या-जेसे पाप तथा पिशाचत्वका भी विनाश करनेवाली है। इसका व्रत करने वाले के लिए कहा गया है कि इसका ब्रत करनेपर मनुष्योंको कभी प्रेतयोनिमें नहीं जाना पड़ता। इसीलिए प्रयासपूर्वक Jaya Ekadashi Vrat करने की सलाह दी जाती है।
जया एकादशी व्रत कथा: स्वर्ग से पिशाचयोनि तक और फिर मुक्ति की कहानी
Jaya Ekadashi Vrat Katha का वर्णन पद्म पुराण में मिलता है। यह कथा देवराज इंद्र, गंधर्व माल्यवान और पुष्पवंती की है।
एक समय की बात है, स्वर्गलोक में देवराज इंद्र राज्य करते थे। देवगण पारिजात वृक्षोंसे भरे हुए नन्दनवनमें अप्सराओंके साथ विहार कर रहे थे। देवराज इंद्र ने एक भव्य नृत्य और संगीत का आयोजन किया, जिसमें “पचास करोड़ गन्धर्वोंकी नायक चित्रसेन तथा अन्य गंधर्व शामिल थे। चित्रसेन की पत्नी मालिनी से उत्पन्न पुत्री थी पुष्पवंती। वहीं, एक अन्य प्रमुख गंधर्व पुष्पदंत के पुत्र थे माल्यवान।
माल्यवान् पुष्पवन्तीके रूपपर अत्यन्त मोहित था। जब दोनों इंद्रदेव के समक्ष नृत्य-गान प्रस्तुत कर रहे थे, तब “परस्पर अनुरागके कारण ये दोनों मोहके वशीभूत हो गये। चित्तमें भ्रान्ति आ गयी। इसलिये वे शुद्ध गान न गा सके। कभी ताल भंग हो जाता और कभी गीत बंद हो जाता था।
यह देखकर इंद्रदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने दोनों को शाप दे दिया: ओ मूर्खों! तुम दोनोंको धिक्कार है! तुमलोग पतित और मेरी आज्ञा भंग करनेवाले हो; अतः पति-पत्नीके रूपमें रहते हुए पिशाच हो जाओ ।
इंद्र के शाप से “इन दोनोंके मनमें बड़ा दुःख हुआ | वे हिमालय पर्वतपर चले गये और पिशाचयोनिको पाकर भयङ्कर दुःख भोगने लगे।” एक दिन, पीड़ित होकर माल्यवान ने पुष्पवंती से कहा: हमने कौन-सा पाप किया है, जिससे यह पिशाच-योनि प्राप्त हुई है ? नरकका कष्ट अत्यन्त भयङ्कर है तथा पिशाचयोनि भी बहुत दुःख देनेवाली है ।
व्रत का प्रताप: पिशाचत्व हुआ नष्ट, स्वर्गलोक में वापसी
दैवयोग से उस समय माघ मास की शुक्ल एकादशी – जया एकादशी का दिन आया। जया नाम से विख्यात तिथि, जो सब तिथियोंमें उत्तम है, आयी । उस दिन उन दोनोंने संकल्प लिया और सब प्रकार के आहार त्याग दिये। जलपान तक नहीं किया। किसी जीव की हिंसा नहीं की, यहाँतक कि फल भी नहीं खाया। वे दुखी मन से एक पीपल के पास बैठे रहे। सूर्यास्त हो गया । उनके प्राण लेनेवाली भयङ्कर रात उपस्थित हुई | उन्हें नींद नहीं आयी | इस प्रकार उन्होंने पूरे नियम से रात्रि जागरण सहित जया एकादशी का व्रत पूरा किया।
व्रत के प्रभाव से चमत्कार हुआ। उस व्रत के प्रभाव से तथा भगवान विष्णु की कृपा से उन दोनों की पिशाचता दूर हो गई। माल्यवान और पुष्पवंती अपने दिव्य रूप में लौट आए और स्वर्गलोक पहुंचे। इंद्रदेव ने आश्चर्य से पूछा: बताओ, किस पुण्यके प्रभावसे तुम दोनोंका पिशाचत्व दूर हुआ है?
माल्यवान ने उत्तर दिया: स्वामिन! भगवान् वासुदेवकी कृपा तथा “जया” नामक एकादशीके ब्रतसे हमारी पिशाचता दूर हुई है।
इंद्रदेव ने कहा: तो अब तुम दोनों मेरे कहनेसे सुधापान करो । जो लोग एकादशीके ब्रतमें तत्पर और भगवान् श्रीकृष्णके शरणागत होते हैं, वे हमारे भी पूजनीय हैं।
जया एकादशी व्रत विधि, महत्व और फल
व्रत तिथि: माघ मास, शुक्ल पक्ष, एकादशी।
विधि: दशमी की रात से ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। व्रत का संकल्प लें। दिनभर निराहार या फलाहार रहकर भगवान का स्मरण करें। रात्रि में जागरण और कीर्तन करें। द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद पारण (व्रत तोड़ना) करें।
महत्व और फल: इस व्रत का महात्म्य अद्वितीय है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं— राजन्! इस कारण एकादशीका ब्रत करना चाहिये | नृपश्रेष्ठ ! ‘जया’ ब्रह्महत्याका पाप भी दूर करनेवाली है। यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला और मोक्षदायी है। जिसने ‘जया’ का ब्रत किया है, उसने सब प्रकारके दान दे दिये ओर सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया। इसकी कथा का श्रवण और पाठ भी अत्यंत फलदायी है— इस माहात्म्य के पढ़ने ओर सुननेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है।
निष्कर्ष
जया एकादशी की यह पावन Jaya Ekadashi Vrat Katha हमें भक्ति, अनुशासन और व्रत के अद्भुत प्रभाव का ज्ञान कराती है। यह कथा दर्शाती है कि भगवान विष्णु की शरण और एकादशी जैसे पावन व्रत का पालन किस प्रकार मनुष्य को किसी भी भयंकर दुःख और पाप से मुक्ति दिला सकता है। आइए, हम सभी माघ मास में आने वाली इस Jaya Ekadashi के पवित्र अवसर पर विधि-विधान से व्रत का पालन करें और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त कर जीवन को धन्य बनाएं।