रामायण की पावन गाथा में जहाँ अनेक भक्तों के प्रसंग मिलते हैं, वहाँ श्री सबरी जी का चरित्र (Sabri katha) अद्वितीय और प्रेरणादायक है। एक साधारण भीलनी से परम भागवत भक्ति तक का उनका सफर केवल एक कथा नहीं, बल्कि भक्ति की शुद्धता, साधना और प्रेम की महान परिभाषा है। आइए, जानते हैं Sabri जी के जीवन की वह पावन गाथा जो हर भक्त के हृदय को झंकृत कर देती है।
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Toggleबाल्यकाल: लोकविलक्षण प्रवृत्ति
समस्त प्रेमी भक्तों में शिरोमणि रूपी श्री सबरी जी किसी हेतु से भिल्ल जाति में उत्पन्न हुईं, परन्तु बालपन से ही उनकी दशा तथा मति लोक से विलक्षण थी। जब वे विवाह योग्य अवस्था को प्राप्त हुईं, तब माता-पिता उनके प्रबन्ध में लग गए। संबंधी लोगों के भक्षण के लिए बहुत से जीव एकत्र किए गए। यह देखकर उन्होंने विचार किया—
“ओह! मेरे निमित्त इतने जीवों का वध होगा। धिक् है इस लोक के प्रपंच को।”
रात्रि में उन्होंने उन सब जीवों को छोड़ दिया और उसी रात वहाँ से चलकर पंपासर के पास जा छुपीं। वहीं वन के फल-मूल से निर्वाह करती हुई अपने दिन बिताने लगीं। उसी वन में वे रहती थीं। उन्हें सब लोग सबरी कहा करते थी।
गुरु की खोज और सेवाभाव
इन्हें संतों की सेवा की विशेष चाह थी, परंतु अपनी नीच जाति जानकर वे साधुओं के समीप नहीं जाती थीं। तथापि बिना सेवा किए उनसे रहा नहीं जाता था। इसलिए वे रात्रि के समय श्री मतंग आदि ऋषिजनों के आश्रम में लकड़ियों के बोझ रख आया करती थीं और मन में इससे बड़ा सुख मानती थीं। स्नान के मार्ग की कंकड़ियाँ भी वे रात्रि में ही बाहर फेंक आया करती थीं, ताकि कोई उन्हें देख न ले।
श्रीराम-भक्त ऋषिजन प्रातः उठकर इस टहल को देखकर विचार करते थे—
“मार्ग को स्वच्छ कर बाहर लकड़ियाँ रख जाने वाला यह पुण्यात्मा कौन है?”
सब ऋषियों में बड़े और असंग, श्रीराम-रंग से पूर्ण श्री मतंग जी लकड़ियों का बोझ धरा देखकर बोले—
“हमारे यज्ञ का यह चोर कौन है, जो नित्य ही चोरी से सेवा करके चला जाता है? उस प्रीतिवान को बिना देखे ही उसकी प्रीति ने मेरे मन को चंचल कर रखा है। रात्रि में जागकर उसको पकड़ो।”
श्री मतंग जी की कृपा: जाति के बंधन से मुक्ति
रात को शिष्यों ने सावधानीपूर्वक चौकी देकर उसे पकड़ लिया। तब शिष्यों ने उससे पूछा—
“तू यहाँ लकड़ियाँ पहुँचाने के लिए किससे आज्ञा पाकर आई है?”
अत्यधिक भय से काँपती हुई वह हृदयपूर्वक पाँवों पर गिर पड़ी। यह दृश्य देखते ही श्री मतंग जी के नेत्रों से प्रेमानंद-जल की धारा प्रवाहित होने लगी। वे ऐसे अकथ आनंद में मग्न हो गए, मानो किसी को सहसा अलौकिक फल प्राप्त हो गया हो।
श्री सबरी जी की तो इतनी संकोचवृत्ति थी कि वे मुनिवर जी के सामने भी नहीं आती थीं। अपनी जाति को अति नीच मानकर वे सोच के प्रवाह में पड़ गई थीं। इधर श्री मतंग मुनि जी भी विचार-चिन्तन में पड़ गए कि इसे इस सोच की धारा से कैसे निकाला जाए, क्योंकि ऋषिवर श्रीराम-भक्ति के प्रताप को भली-भाँति जानते थे।
वे शिष्यों से कहने लगे—
“यह जाति की दृष्टि से नीच है, यह सत्य है; परंतु इसकी भक्ति के सामने तो करोड़ों ब्राह्मणों का अभिमान भी न्योछावर करना योग्य है।”
अंततः श्री सबरी जी को अपने ही आश्रम में निवास देकर उन्होंने उन्हें श्री सीताराम नाम का श्रवण कराया। इस बात को सुनकर अन्य साधुजन अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने अपनी जाति-पंक्ति से अलग कर दिया। किंतु इस हर्ष-विषाद का श्रीराम-भक्त मतंग मुनि जी पर लेशमात्र भी प्रभाव न पड़ा। श्री सबरी जी सेवा में तत्पर होकर रहने लगीं।
गुरु का अंतिम उपदेश और प्रभु के आगमन का वरदान
कुछ काल पश्चात श्री मतंग जी के देह-त्याग का समय आ पहुँचा। तब उन्होंने श्री सबरी जी से कहा—
“पुत्री, अब इस लोक में रहने की प्रभु की आज्ञा नहीं रही। मैं श्रीरामधाम को जाता हूँ, परंतु तुम यहीं वन में रहना।”
यह सुनकर श्री सबरी जी अत्यंत व्याकुल हो उठीं। तब उन्होंने उन्हें समझाते हुए कहा—
“मेरे इस आश्रम में परब्रह्म परमात्मा श्री रामचन्द्र जी, अपने अनुज श्री लक्ष्मण जी के सहित अवश्य पधारेंगे। तुम उनका दर्शन और पूजन सप्रेम करना। तत्पश्चात तुम भी श्रीरामधाम को आना।”
ऐसा उपदेश देकर श्री मतंग मुनि जी परमधाम को पधार गए।
प्रतीक्षा की घड़ियाँ और अपमान का दंश
श्री सबरी जी को श्री गुरु-वियोग से बड़ा ही दुःसह कष्ट हुआ। उनके शरीर की दुर्बल अवस्था ऐसी हो गई कि वे प्राण भी धारण नहीं करना चाहती थीं; परंतु श्रीराम-रूप के दर्शन की तीव्र लालसा ने उनके प्राणों को निकलने न दिया। वे मुनियों के स्नान-पथ को रात्रि में ही स्वच्छ कर आया करती थीं।
एक दिन उन्हें कुछ अधिक विलंब हो गया। प्रतिकूल स्वभाव वाले एक मुनि ने श्री सबरी जी को देख लिया। इससे वे भय से अत्यंत व्यथित हो गईं। वन का मार्ग संकीर्ण था; उसी संके मार्ग में उनके तन से किंचित् स्पर्श हो जाने की आशंका मात्र से वह मुनि क्रोधित हो उठा। जाति-अभिमान और अहंकार के वशीभूत होकर उसने इस तुच्छ कारण पर श्री सबरी जी से हट जाने को कहा और उन पर अनेक कठोर तथा अपमानजनक दुर्वचन कहे।
इसके पश्चात वह मुनि पुनः जाकर स्नान करने लगा और श्री सबरी जी शीघ्र ही अपनी कुटिया में लौट आईं। जब मुनि स्नान करने लगे, तब श्रीराम-भक्त सबरी जी के प्रति किए गए अपराध के फलस्वरूप उस जल में रुधिर (अर्थात् रक्त) उत्पन्न हो गया, और देखते-देखते उस सरोवर में कीड़े भी पड़ गए। यह दृश्य देखकर भी वह मुनि अपने अपराध को न समझ सका और उलटे यही कहने लगा कि सबरी के स्पर्श-दोष से ही यह जल दूषित हुआ है।
प्रभु की प्रतीक्षा में चखे बेर: Sabri Katha का हृदयस्पर्शी प्रसंग
श्री सबरी जी के मन में श्री राम जी के प्रति अत्यंत आतुरता थी। अर्थात् प्रभु के आगमन की आशा और आशंका में वे सदा संदेह और प्रतीक्षा के भाव में मग्न रहती थीं। वे वन के बेर आदि फल लाकर उन्हें पहले स्वयं चखती थीं और जो फल मीठे तथा प्रभु के योग्य जान पड़ते, उन्हें अलग रख छोड़ती थीं।
प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा में वे अपनी आँखें पथ पर लगाए रखती थीं और अत्यंत उत्कंठा से मन ही मन यह विचार करती रहती थीं—
“कब वह शुभ दिन आएगा? कब श्री रघुनन्दन लाल जी पधारेंगे और उनके दर्शन-रूपी अमृत से मेरे नेत्र तृप्त होंगे?”
प्रिय पाठक! श्री सबरी जी का प्रेम अकथ और अनुपम था। ‘गीतावली’ में गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने भी इस प्रेम का सुंदर वर्णन किया है—
“छन भवन, छन बाहर बिलोकत पंथ…” इत्यादि।
श्रीराम-लक्ष्मण का आगमन और भेंट
इसी प्रकार मार्ग की ओर दृष्टि लगाए हुए बहुत दिन व्यतीत हो गए। अकस्मात् एक दिन श्री राम जी के आगमन की आहट मिली। यह सुनते ही उनके मन के सब शोक और संदेह क्षणभर में दूर हो गए; परंतु तभी उन्हें अपने शरीर की नीचता का भान हुआ। प्रेम की विचित्र विकलता में वे खड़ी भी न रह सकीं, बल्कि लज्जा और भक्ति से भरकर भूमि पर गिर पड़ीं।
उधर प्रभु वन में आकर वनवासी लोगों से पूछने लगे—
“वह सरस भक्तिभाव से युक्त सबरी कहाँ निवास करती है?”
इस प्रकार पूछते-पूछते प्रभु उस स्थान पर पहुँचे जहाँ श्री सबरी जी की कुटिया थी। वहाँ आकर उन्होंने यह वचन कहा—
“हमारी वह परम भागवती सबरी कहाँ है? हम उसे जी भरकर देखना चाहते हैं। हमारे नेत्र उसके दर्शन-रूपी जल के प्यासे हो रहे हैं।”
प्रभु के प्रेमपूर्ण श्रीमुख से निकले इन वचनों को सुनकर श्री सबरी जी के हृदय से अपनी नीचता का सारा शोक मिट गया। उन्होंने देखा कि आश्रम में ही दोनों भ्राता—श्री राम और श्री लक्ष्मण—साक्षात् खड़े हैं। यह देखते ही वे आगे बढ़ीं और जहाँ से प्रभु के दर्शन हुए, वहीं प्रेम-परिपूर्ण भाव से साष्टांग प्रणाम किया।
प्रभु ललक से आगे बढ़े और अपने श्रीकर-कमलों से श्री सबरी जी को उठाया। उनके कर-स्पर्श मात्र से ही वियोग की सारी व्यथा दूर हो गई और नेत्रों से नवीन प्रेममय अश्रुधारा बहने लगी। उस क्षण उनके नेत्र मानो श्रीराम-प्रेम-पाश में बँध गए थे।
प्रेमभोजन और भक्ति की स्वीकार्यता
इसके पश्चात उन्होंने प्रभु के चरण धोए और दोनों भ्राताओं को आदरपूर्वक रंजित आसनों पर बैठाया। प्रेम से पुष्पमालाएँ अर्पित कीं और वनों से लाए हुए फलों को नवीन-नवीन दोने में सजाकर सामने रख दिया। प्रभु उन फलों को खाते हुए बार-बार उनके स्वाद की प्रशंसा करने लगे। साथ ही शिव जी आदि देवगण भी सबरी जी के सौभाग्य और प्रभु की भक्तवत्सलता की सराहना करने लगे।
तब प्रभु बोले—
“आज तुमने मेरे मार्ग के समस्त परिश्रम और दुःखों को मिटाकर मुझे परम सुख प्रदान किया है।”
जल शुद्धि का चमत्कार और भक्ति की विजय
उधर ऋषिजन अपने-अपने आश्रमों में यह सोच रहे थे कि यह जल जो दूषित हो गया है, उसकी शुद्धि किस प्रकार होगी। इतने में किसी ने यह विचार प्रकट किया कि मार्ग से होकर श्री रघुनाथ जी अवश्य पधारे होंगे। जब वे यहाँ आएँगे, तब इस जल के दूषित होने का कारण और उसकी शुद्धि का उपाय उन्हीं से पूछा जाएगा।
यह बातें अभी चल ही रही थीं कि किसी क्षण यह समाचार सुनाई पड़ा कि प्रभु तो पहले ही सबरी जी की कुटिया में विराजमान हैं। यह सुनते ही सबके हृदय से अभिमान दूर हो गया और लोग कहने लगे—
“चलो, उनके चरणों में दण्डवत् प्रणाम करें।”
वे सब वहाँ पहुँचे और प्रभु से विनयपूर्वक कहने लगे—
“हे प्रभु! हमारे स्नान-पान का जल दूषित हो गया है। कृपा करके इसके शुद्ध होने का उपाय बताइए।”
इसके उत्तर में प्रभु ने कहा—
“आप लोगों ने परम भागवती सबरी का अनादर किया है। उसी भक्तापराध के कारण जल की यह दुर्दशा हुई है। अतः आप सब सादर जाकर उनके चरणों में दण्डवत् प्रणाम करें और उनके चरण-रज का स्पर्श जल में कराएँ। तब निश्चय ही जल निर्मल हो जाएगा और आप सुखपूर्वक स्नान-पान कर सकेंगे।”
प्रभु की आज्ञा पाकर उन्होंने वैसा ही किया, और देखते ही देखते जल परम निर्मल तथा स्वादयुक्त हो गया।
प्राण-न्योछावर और परमधाम गमन
जब ऋषिजन वहाँ से विदा लेने लगे, तब श्री सबरी जी ने अपना प्राण न्योछावर कर दिया और परमधाम को प्रस्थान किया। धन्य, धन्य! अहो! रीति-परीक्षण करने वाली श्री सबरी जी के प्रेम की कैसी अद्भुत महिमा है! प्रभु की भक्तवत्सलता की भी क्या ही प्रशंसा की जाए—दोनों ही अनुपम हैं।
निष्कर्ष: शुद्ध प्रेम की अमर गाथा
देखिए, प्रभु ने केवल प्रेम को ही स्वीकार किया। जिस प्रकार माता अपने पुत्र को प्रेम से भोजन कराती है, उसी भाव से अर्पित किए गए फलों को प्रभु ने श्रीमाता कौशल्या महारानी के द्वारा कराए गए भोजनों से भी अधिक स्वादिष्ट मानकर ग्रहण किया।
श्री सबरी जी की कथा (Sabri katha) हमें सिखाती है कि भक्ति में जाति, कुल या बाह्य आडंबर का कोई स्थान नहीं है। शुद्ध हृदय से किया गया प्रेमपूर्ण सेवाभाव ही प्रभु को बाँधता है। Sabri in Ramayan का चरित्र आज भी हमें यही संदेश देता है कि ईश्वर केवल भाव के भूखे हैं, रूप या समाजिक स्तर के नहीं।
इस प्रेम की जय हो!
इस निष्कलुष प्रेम-भाव और भक्तवत्सलता की जय हो!
सबरी जी की भक्ति कथा ने दिखाया कि ईश्वर की दृष्टि में जाति या वर्ण का कोई स्थान नहीं, केवल शुद्ध भावना महत्व रखती है। ऐसी ही एक और अनुपम कथा है संत चोखामेला जी की, जो महार जाति में जन्मे होने के बावजूद विठ्ठल भक्ति में सदा लीन रहे और समाज को भक्ति का वास्तविक अर्थ सिखाया। उनकी प्रेरणादायक गाथा जानने के लिए उनके नाम पर क्लिक करें।