कौन था ताड़कासुर?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, ताड़कासुर एक शक्तिशाली राक्षस था। वह राक्षस राज सुंद और उसकी पत्नी ताड़का का पुत्र था। ताड़का स्वयं एक शक्तिशाली राक्षसी थी, जिसका वध बाद में भगवान राम ने किया था। ताड़कासुर ने अपनी माता की भांति ही अत्याचार के मार्ग पर चलने का निश्चय किया, लेकिन उससे पहले वह शक्ति की खोज में निकल पड़ा।
घोर तपस्या और वरदान
ताड़कासुर ने शक्ति प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या करने का निश्चय किया। वह घने जंगलों में भटकता हुआ उस स्थान पर पहुंचा, जहां आज Tadkeshwar Mahadev मंदिर स्थित है। उस समय यह स्थान अत्यंत शांत और दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण था।
ताड़कासुर ने यहां भगवान शिव की आराधना शुरू की। उसकी तपस्या इतनी कठोर थी कि वह वर्षों तक निराहार रहकर, कठिन व्रत और साधना में लीन रहा। कहा जाता है कि उसने एक पैर पर खड़े होकर हजारों वर्षों तक तपस्या की। उसकी तपस्या से तीनों लोक तपने लगे।
अंततः भगवान शिव उसकी कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे दर्शन दिए। भगवान शिव ने वरदान मांगने को कहा। ताड़कासुर ने अमरता का वरदान मांगा। भगवान शिव ने उसे अमर तो नहीं किया, लेकिन यह वरदान दिया कि उसकी मृत्यु केवल शिवपुत्र के हाथों होगी।
वरदान का दुरुपयोग और अत्याचार
वरदान पाकर ताड़कासुर अहंकारी हो गया। उसने सोचा कि शिवपुत्र का जन्म अभी होना बाकी है और तब तक वह अमर है। उसने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया। उसने ऋषियों-मुनियों के आश्रमों को नष्ट करना शुरू कर दिया, यज्ञों में विघ्न डालना शुरू कर दिया, और देवताओं को भी परेशान करना शुरू कर दिया।
उसके अत्याचारों से त्रस्त होकर सभी देवता और ऋषिगण भगवान ब्रह्मा और विष्णु के पास गए। तीनों देवों ने मिलकर इस समस्या का समाधान ढूंढा।
शिव-पार्वती विवाह और कार्तिकेय का जन्म
ताड़कासुर के वध के लिए आवश्यक था कि शिवपुत्र का जन्म हो। उस समय भगवान शिव गहन समाधि में लीन थे और माता पार्वती उन्हें पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या कर रही थीं। देवताओं ने कामदेव को भेजा, जिसने भगवान शिव की समाधि भंग की। क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया, लेकिन पार्वती जी के प्रेम और तपस्या से प्रभावित होकर उन्होंने उनसे विवाह कर लिया।
इस विवाह से भगवान कार्तिकेय (स्वामी कार्तिकेय) का जन्म हुआ। कार्तिकेय जी ने देवताओं के सेनापति बनकर ताड़कासुर से युद्ध किया और अंततः इसी क्षेत्र में उसका वध कर दिया।
ताड़केश्वर नाम की उत्पत्ति
जिस स्थान पर ताड़कासुर ने तपस्या की थी और जहां भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए थे, वह स्थान ‘ताड़केश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ‘ताड़क’ + ‘ईश्वर’ अर्थात ताड़कासुर के ईश्वर (भगवान शिव)। कुछ विद्वानों का मानना है कि मूल नाम ‘तारकेश्वर’ था, जो समय के साथ स्थानीय बोली में ‘ताड़केश्वर’ हो गया।