प्राचीन समय की बात है। मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह बहुत धार्मिक थी और हमेशा व्रत-उपवास किया करती थी। एक बार उसने पूरे एक महीने तक लगातार व्रत रखा, जिससे उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। वह समझदार तो थी, लेकिन उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों को अन्न या धन का दान नहीं किया था।
भगवान ने यह देखा और मन ही मन सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत करके अपने शरीर को तो शुद्ध कर लिया है, इसलिए इसे स्वर्ग अवश्य मिलेगा। लेकिन इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इसलिए वहाँ इसे संतोष मिलना कठिन होगा।
यह सोचकर भगवान भिखारी का वेश बनाकर उस ब्राह्मणी के पास गए और भिक्षा माँगी। ब्राह्मणी ने पूछा, “महाराज, आप क्यों आए हैं?” भगवान ने कहा, “मुझे भिक्षा चाहिए।” इस पर ब्राह्मणी ने भिक्षापात्र में एक मिट्टी का ढेला डाल दिया। भगवान उसे लेकर स्वर्ग लौट गए।
कुछ समय बाद वह ब्राह्मणी भी देह त्याग कर स्वर्ग पहुँच गई। मिट्टी का दान करने के कारण उसे स्वर्ग में एक सुंदर महल तो मिला, लेकिन उसके घर में अन्न और आवश्यक वस्तुएँ बिल्कुल नहीं थीं।
यह देखकर वह घबरा गई और भगवान के पास जाकर बोली, “भगवन्! मैंने जीवन भर व्रत और पूजा की, फिर भी मेरा घर अन्न से खाली क्यों है?”
भगवान ने कहा, “पहले तुम अपने घर जाओ। कुछ देवस्त्रियाँ तुम्हें देखने आएँगी। द्वार खोलने से पहले उनसे षटतिला एकादशी का महत्व और विधि सुन लेना।”
षटतिला एकादशी का महत्व और दान का फल
ब्राह्मणी भगवान की बात मानकर अपने घर चली गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा, तब ब्राह्मणी ने कहा, “यदि आप मुझे देखने आई हैं, तो पहले मुझे षटतिला एकादशी की कथा सुनाइए।” देवस्त्रियों में से एक ने उसे षटतिला एकादशी का पूरा महत्व समझाया।
कथा सुनने के बाद ब्राह्मणी ने द्वार खोला। देवस्त्रियों ने देखा कि वह न तो कोई देवी है और न ही कोई राक्षसी, बल्कि एक साधारण मनुष्य है। इसके बाद ब्राह्मणी ने बताई गई विधि के अनुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया।
इस व्रत के प्रभाव से वह सुंदर और तेजस्वी हो गई और उसका घर अन्न, धन और सभी आवश्यक वस्तुओं से भर गया।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि केवल व्रत और पूजा ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि दान भी बहुत आवश्यक है। इसलिए मनुष्य को षटतिला एकादशी का व्रत करना चाहिए और तिल आदि का दान करना चाहिए। इससे दरिद्रता, दुर्भाग्य और कष्ट दूर होते हैं तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।