एकादशी 2026

Shattila Ekadashi: जब भगवान बने भिखारी: षटतिला एकादशी की कथा

क्या आपने कभी महसूस किया है कि जीवन में सब कुछ होने के बाद भी मन एक अजीब सी खालीपन से भरा रहता है? धन है, सुविधाएं हैं, यहाँ तक कि धार्मिक अनुष्ठान भी हैं, फिर भी आत्मिक तृप्ति क्यों दूर रह जाती है? इसका उत्तर छुपा है Shattila Ekadashi यानी षटतिला एकादशी की प्राचीन कथा में, जो हमें सिखाती है कि बिना दान के साधना अधूरी है।  यह वही पावन माघ मास है जिसमें मकर संक्रांति जैसा महापर्व भी मनाया जाता है, जो सूर्य की उत्तरायण गति और नई शुरुआत का प्रतीक है।

हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को Shattila Ekadashi या षटतिला  एकादशी कहा जाता है। ‘सत’ यानी सात (या अनेक) प्रकार के तिल और ‘तिला’ यानी तिल का दान। यह एकादशी केवल उपवास का दिन नहीं, बल्कि मन के संचित विकारों और कंजूसी को दूर करने का एक शक्तिशाली उपाय है। यह हमें याद दिलाती है कि भक्ति का मार्ग साधना और सेवा के दो पहियों से ही पूरा होता है।

षटतिला एकादशी की कथा: जब भगवान ने लिया भिखारी का रूप

प्राचीन समय की बात है। मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह बहुत धार्मिक थी और हमेशा व्रत-उपवास किया करती थी। एक बार उसने पूरे एक महीने तक लगातार व्रत रखा, जिससे उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। वह समझदार तो थी, लेकिन उसने कभी देवताओं या ब्राह्मणों को अन्न या धन का दान नहीं किया था।

भगवान ने यह देखा और मन ही मन सोचा कि इस ब्राह्मणी ने व्रत करके अपने शरीर को तो शुद्ध कर लिया है, इसलिए इसे स्वर्ग अवश्य मिलेगा। लेकिन इसने कभी अन्न का दान नहीं किया, इसलिए वहाँ इसे संतोष मिलना कठिन होगा।

यह सोचकर भगवान भिखारी का वेश बनाकर उस ब्राह्मणी के पास गए और भिक्षा माँगी। ब्राह्मणी ने पूछा, “महाराज, आप क्यों आए हैं?” भगवान ने कहा, “मुझे भिक्षा चाहिए।” इस पर ब्राह्मणी ने भिक्षापात्र में एक मिट्टी का ढेला डाल दिया। भगवान उसे लेकर स्वर्ग लौट गए।

कुछ समय बाद वह ब्राह्मणी भी देह त्याग कर स्वर्ग पहुँच गई। मिट्टी का दान करने के कारण उसे स्वर्ग में एक सुंदर महल तो मिला, लेकिन उसके घर में अन्न और आवश्यक वस्तुएँ बिल्कुल नहीं थीं।

यह देखकर वह घबरा गई और भगवान के पास जाकर बोली, “भगवन्! मैंने जीवन भर व्रत और पूजा की, फिर भी मेरा घर अन्न से खाली क्यों है?”
भगवान ने कहा, “पहले तुम अपने घर जाओ। कुछ देवस्त्रियाँ तुम्हें देखने आएँगी। द्वार खोलने से पहले उनसे षटतिला एकादशी का महत्व और विधि सुन लेना।”

षटतिला एकादशी का महत्व और दान का फल

ब्राह्मणी भगवान की बात मानकर अपने घर चली गई। जब देवस्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा, तब ब्राह्मणी ने कहा, “यदि आप मुझे देखने आई हैं, तो पहले मुझे षटतिला एकादशी की कथा सुनाइए।” देवस्त्रियों में से एक ने उसे षटतिला एकादशी का पूरा महत्व समझाया।

कथा सुनने के बाद ब्राह्मणी ने द्वार खोला। देवस्त्रियों ने देखा कि वह न तो कोई देवी है और न ही कोई राक्षसी, बल्कि एक साधारण मनुष्य है। इसके बाद ब्राह्मणी ने बताई गई विधि के अनुसार षटतिला एकादशी का व्रत किया।

इस व्रत के प्रभाव से वह सुंदर और तेजस्वी हो गई और उसका घर अन्न, धन और सभी आवश्यक वस्तुओं से भर गया।

इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि केवल व्रत और पूजा ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि दान भी बहुत आवश्यक है। इसलिए मनुष्य को षटतिला एकादशी का व्रत करना चाहिए और तिल आदि का दान करना चाहिए। इससे दरिद्रता, दुर्भाग्य और कष्ट दूर होते हैं तथा अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Shattila Ekadashi Puja Vidhi — नियम, दान और महत्त्व

मनुष्य को चाहिए कि वह प्रातः स्नान कर स्वयं को पवित्र करे और अपनी इन्द्रियों को संयम में रखते हुए काम, क्रोध, लोभ, अहंकार, चुगली आदि सभी दुष्प्रवृत्तियों का त्याग करे। कृष्ण पक्ष की Shattila Ekadashi का व्रत धारण करने से पूर्व नियम लें। स्नान के बाद पवित्र होकर शुद्ध भाव से देवाधिदेव श्रीविष्णु की पूजा करें। यदि पूजन में कोई भूल हो जाए तो भगवान श्रीकृष्ण का नाम स्मरण करें।

रात्रि में जागरण करें तथा हवन करें। चंदन, कपूर, नैवेद्य, अरगजा आदि पूजन सामग्रियों से
शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले जगत्पति श्रीहरि की आराधना करें।

प्रार्थना में विनम्रता से कहें—

सच्चिदानंद स्वरूप श्रीकृष्ण!  आप अत्यंत दयालु हैं।
हम आश्रयहीन जीवों के आप ही आश्रयदाता हैं।
पुरुषोत्तम! हम संसार रूपी समुद्र में डूब रहे हैं,
कृपया हम पर प्रसन्न हों।
कमलनयन! आपको नमस्कार है।
विश्वभावन! आपको नमस्कार है।
सनातन महापुरुष! सबके पूर्वज! आपको नमस्कार है।
हे जगत्पति! लक्ष्मीजी सहित मेरे द्वारा समर्पित यह अर्घ्य स्वीकार करें।

इसके पश्चात् संत ब्राह्मण का पूजन करें तथा उसे जल से भरा कलश, वस्त्र, जूते और छाता दान करें। दान करते समय कहें—“इस दान से भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों।” अपनी सामर्थ्य अनुसार उत्तम ब्राह्मण को काली गाय का दान करें। विद्वान पुरुष को तिल से भरा पात्र अवश्य दान देना चाहिए।

क्योंकि शास्त्रों में कहा गया है—

उन तिलों के बोए जाने पर उनसे जितनी शाखाएँ उत्पन्न हों,
उनकी संख्या के बराबर हजारों वर्षों तक स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।

Shattila Ekadashi Vrat Vidhi: तिल के छः प्रयोग का रहस्य

भगवान ने ब्राह्मणी को Shattila Ekadashi के व्रत का विधान बताया, जिसमें तिल के छह प्रकार से उपयोग का विधान है:

  1. तिल से स्नान: तिल मिले जल से स्नान करना।

  2. तिल का उबटन: शरीर पर तिल का उबटन लगाना।

  3. तिल से हवन: तिल की आहुति देकर हवन करना।

  4. तिल का जल: तिल मिला हुआ जल पीना।

  5. तिल का दान: तिल दान करना सबसे महत्वपूर्ण।

  6. तिल का भोजन: तिल युक्त भोजन ग्रहण करना।

इन छह क्रियाओं के माध्यम से तिल (तिल) शरीर, मन और कर्म तीनों स्तर पर शुद्धि करता है। तिल का दान विशेष रूप से मन के भीतर की कंजूसी और आसक्ति को दूर करता है।

ब्राह्मणी ने पूरे हृदय से Shattila Ekadashi का व्रत किया और तिल का दान दिया। पहली बार उसने अनुभव किया कि भगवान उसके संग्रहीत अन्न में नहीं, बल्कि उन हाथों में विराजमान हैं जिन्हें वह दान दे रही है। उन आंखों की चमक में हैं जिन्हें तृप्ति मिल रही है। व्रत के प्रभाव से उसके घर का अन्न फिर से सुगंधित हो गया और उसके हृदय में एक गहरा आनंद एवं शांति उतर आई।

इस कथा से यह संदेश मिलता है कि हमारी आध्यात्मिक साधना तभी सार्थक होती है जब उसमें दूसरों के प्रति करुणा और उदारता का भाव जुड़ा हो। एकादशी का व्रत केवल शारीरिक उपवास नहीं, बल्कि मन के लोभ, अहंकार और आसक्ति का भी उपवास है।

निष्कर्ष

Shattila Ekadashi हमें एक मूलभूत सत्य की ओर इशारा करती है: जीवन की सच्ची समृद्धि संचय में नहीं, बल्कि त्याग और साझा करने में निहित है। यह व्रत हमें याद दिलाता है कि हमारा यह मानव जन्म केवल व्यक्तिगत साधना के लिए ही नहीं, बल्कि दूसरों के कल्याण और सेवा के लिए भी प्राप्त हुआ है। जब तक हमारी भक्ति में दान और करुणा का अंश नहीं होगा, तब तक आत्मिक तृप्ति दूर ही रहेगी।

आइए, इस Shattila Ekadashi पर हम केवल उपवास ही न करें, बल्कि अपने हृदय को उदार बनाने का भी संकल्प लें। थोड़ा सा दान, एक मुस्कुराहट बांटना, या किसी की सहायता करना – यही इस पावन तिथि का वास्तविक सार है। क्योंकि सच्चा भगवान तो सेवा के कर्म में ही प्रकट होता है।

Wishing You a Happy Shattila Ekadashi

हरे कृष्ण राधे राधे।

Venu Sharan

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