लीलावती का व्रत एवं राजा चन्द्रकेतु को सत्यानारायण भगवान का आदेश
कन्या की बात सुनकर लीलावती व्रत करने के लिए तैयार हुई। उस साध्वी, धर्मपरायण साधु-पत्नी ने अपने सुदृढ़ बंधुओं के साथ मिलकर Satyanarayan Vrat विधिपूर्वक सम्पन्न किया।
वह बार-बार प्रार्थना करती रही—हे Satyanarayan Bhagwan! मेरे स्वामी और जामाता शीघ्र घर लौट आएँ। उनके अपराधों को क्षमा कर दीजिए।
व्यापारी-पत्नी की श्रद्धा से सत्यनारायण भगवान अत्यंत प्रसन्न हुए। अतः उन्होंने उसी रात श्रेष्ठ राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा—“राजन्! प्रातःकाल होते ही दोनों वणिकों को कारागार से मुक्त कर देना। तुमने जो धन उनसे छीना है, उसका दुगुना उन्हें लौटा देना। यदि ऐसा न किया तो मैं तुम्हारे राज्य, धन और पुत्र का विनाश कर दूँगा।”
इतना कहकर भगवान सत्यानारायण अंतर्धान हो गए। सुबह होते ही राजा चन्द्रकेतु सभा में पहुँचे और अपने सेवकों को आज्ञा दी—तुरंत जाकर दोनों बंदी महाजनों को मुक्त कर दो। राजा की आज्ञा पाकर दूतों ने दोनों वणिकों को कारागार से बाहर निकाला और विनयपूर्वक उन्हें राजा के समक्ष ले आए।
दोनों वणिकों को अचानक सब स्मरण हो गया—उनके द्वारा भूला हुआ Satyanarayan Vrat,
और भगवान की दिव्य महिमा। वे भाव-विह्वल होकर राजा चन्द्रकेतु को प्रणाम करने लगे। राजा ने भी उन्हें देखकर स्नेहपूर्वक कहा—दैवयोग से तुम्हें यह कष्ट सहना पड़ा। अब भय मत करो—तुम पूर्णतया मुक्त हो।
इसके बाद राजा चन्द्रकेतु ने सोने और रत्नों से बने गहनों से दोनों वणिकों को सम्मानित किया,
मधुर वाणी से उनका मनोबल बढ़ाया, और छीने गए धन से दुगुना धन लौटाते हुए कहा—अब अपने घर जाओ। सुखपूर्वक रहो।
दण्डी रूप में सत्यनारायण भगवान का दर्शन और वणिक का अहंकार
व्यापारी ने राजा को प्रणाम करके कहा—राजन्! आपकी कृपा से ही मैं अपने घर लौटने योग्य हो सका। इसके बाद उसने मंगलाचार करके यात्रा आरम्भ की, मार्ग में ब्राह्मणों को दान दिया और जामाता के साथ अपने नगर की ओर चल पड़ा।
कुछ ही दूर बढ़ने पर Satyanarayan Bhagwan दण्डी के वेश में उनके सामने प्रकट हुए और पूछने लगे—बताओ, तुम्हारी नाव में क्या है?
प्रमाद और अहंकार से भरे व्यापारी ने हँसते हुए अत्यंत अवमानना से कहा—दण्डी! तुम्हें क्यों जानना है? क्या तुम्हें रुपये चाहिए? मेरी नाव में तो केवल लता-पत्र भरे हैं।”
व्यापारी के कठोर और असम्मानजनक वचन सुनकर दण्डी रूपी सत्यनारायण भगवान बोले—तुम्हारे वचन सत्य हों। और यह कहकर वे वहाँ से चले गए। दण्डी के थोड़ी दूर जाने पर व्यापारी समुद्र तट पर पहुँचा। नित्य-कर्म करके जैसे ही नाव पर चढ़ा, उसने देखा—नाव सचमुच लता-पत्र से भरी पड़ी है! यह दृश्य देखकर वह अत्यंत विस्मित हुआ और मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।
कुछ देर बाद चेत आने पर वह गहरे शोक और चिंता में डूब गया। जामाता ने श्वशुर का दुःख देखकर कहा—आप क्यों शोक कर रहे हैं? यह सब दण्डी के शाप का फल है। वे सर्वशक्तिमान हैं—वे ही हर्ता-कर्ता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। हम लोग यदि उनकी शरण लें तो हमारा मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा।
व्यापारी का विलाप और भगवान् दण्डी का उपदेश
जामाता की यह बात सुनकर व्यापारी तुरंत दण्डी (भगवान् के स्वरूप) के पास पहुँचा। उनके दर्शन करके उसने भक्तिभाव से प्रणाम किया और विनम्र होकर बोला— मैं बड़ा दुरात्मा हूँ। आपकी मायामय लीला से मोहित होकर मैंने जो कुछ कहा, उसके लिए मुझे क्षमा करें। मैंने आपके सामने दुष्ट और कठोर वचन कहे हैं। हे नाथ! कृपाकर मुझे क्षमा करें। क्षमा ही साधुओं का वास्तविक धन है। साधुजन तो सदा दूसरों का उपकार करने में लगे रहते हैं।
ऐसा कहकर वह शोक से व्याकुल वणिक् बार-बार प्रणाम करने लगा और रोने लगा। व्यापारी को इस प्रकार विलाप करते देखकर दण्डी ने कहा— रोओ मत, मेरी बात सुनो। दुर्बुद्धि! तुमने मेरा अपमान किया और मेरी पूजा से विमुख हो गए थे। उसी के फलस्वरूप तुम्हें बार-बार दुःख प्राप्त हो रहा है।
भगवान के इन वचनों को सुनकर व्यापारी ने उनकी स्तुति की और बोला— प्रभो! ब्रह्मादि स्वर्गवासी देवता भी आपकी मायाशक्ति से मोहित होकर आपके अद्भुत रूप और गुणों का पूर्ण ज्ञान नहीं कर पाते। मैं भी आपकी मायामाया से बाधित हूँ, फिर आपको कैसे जान सकूँगा?
आप प्रसन्न हों। मैं अपनी सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मैं आपके शरण में हूँ—मुझे पुत्र, धन-वैभव प्रदान कीजिए और मेरी रक्षा कीजिए।
सत्यदेव की कृपा और कलावती की परीक्षा
साधु के भक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर भगवान जनार्दन अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे मनोवांछित वर देकर वहीं अंतर्धान हो गए। इसके पश्चात् जब साधु नाव पर चढ़ा, तो उसने देखा कि नौका रत्नों और धन-वैभव से परिपूर्ण है। वह आनंद से भर उठा और बोला—सत्यदेव की कृपा से मुझे वांछित फल प्राप्त हो गया है।
साधु ने अपने मित्रों के साथ विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा की और प्रसन्नचित्त होकर यात्रा आरम्भ की। नौका तीव्र गति से चलती हुई शीघ्र ही अपने देश के समीप पहुँच गई। व्यापारी ने जामाता से कहा— वत्स! देखो, हमारी पुरी दिखाई दे रही है। इसके बाद उसने अपने धन के रखवाले दूत को नगर में सूचना देने भेजा। दूत लीलावती के पास पहुँचा और हाथ जोड़कर बोला—माताजी! आपके स्वामी नाना प्रकार के धन-रत्नों, अपने जामाता और सुहृद-मित्रों के साथ घर लौट रहे हैं।
यह समाचार सुनकर साध्वी वणिक-पत्नी अत्यंत प्रसन्न हुई। उसने सत्यदेव की पूजा की और अपनी कन्या से कहा—मैं पतिके स्वागत के लिए जा रही हूँ, तुम भी मेरे साथ चलो। माता की आज्ञा सुनते ही कलावती ने सत्यनारायण व्रत पूरा किया, Satyanarayan Bhagwan Ki Katha सुनी परंतु प्रसाद ग्रहण किए बिना ही पति के स्वागत के लिए चल पड़ी। इसी से भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गए।
जैसे ही कलावती किनारे पहुँची, उसी क्षण धन-रत्नों से भरी नाव और उसका जँवाई जल में अदृश्य हो गया। पति को न देखकर कलावती अत्यंत शोकग्रस्त होकर भूमि पर गिर पड़ी और विलाप करने लगी।
कलावती का शोक और सत्यदेव की माया
अपने पति और नाव को न देखकर कलावती अत्यन्त शोकातुर हो गई। कन्या की इस स्थिति को देखकर साधु अत्यन्त भयभीत हो उठा। वह आश्चर्य से सोचने लगा—यह क्या दिव्य घटना घट गई! नाव खेने वाले भी गहरी चिंता में पड़ गए। यह सब देखकर पतिव्रता लीलावती दुःख से विह्वल होकर विलाप करती हुई अपने स्वामी से बोली—
मैंने अभी-अभी जँवाई को देखा था, परन्तु क्षण मात्र में ही नौका सहित वे अदृश्य हो गए। अब कहीं दिखाई नहीं देते। कौन-सा देवता उन्हें इस प्रकार हर ले गया, कौन जानता है! क्या आप सत्यदेव के प्रभाव को नहीं समझते? इतना कहकर लीलावती जोर-जोर से रोने लगी। उसके साथ सभी बंधु-बांधव भी विलाप करने लगे।
लीलावती अपनी पुत्री को गोद में लेकर रुदन करने लगी। स्वामी को डूबा हुआ समझकर कलावती ने अत्यन्त दुःखी मन से पतिकी पादुकाएँ उठाईं और सती होने का दृढ़ निश्चय कर लिया। धर्मज्ञ साधु-वणिक ने कन्या की यह दशा देखी तो वह अपनी पत्नी सहित अत्यन्त व्याकुल हो उठा। उसने मन ही मन चिंतन किया—निश्चय ही सत्यदेव की माया से ही मेरे जामाता अदृश्य हुए हैं। मुझे अवश्य ही अपने वैभव के अनुसार सत्यनारायण भगवान की पूजा करनी चाहिए।
सत्यदेव की करुणा और कलावती का पुनर्मिलन
साधु ने वहाँ उपस्थित सभी लोगों को बुलाकर पूरी घटना कही और अपना मनोभाव प्रकट करते हुए पृथ्वी पर दण्डवत् होकर कई बार भगवान सत्यदेव को प्रणाम करने लगा। उसकी इस श्रद्धा और समर्पण से सत्यदेव प्रसन्न हो गए। तभी आकाश से भगवान की दिव्य वाणी प्रकट हुई—साधो! तुम्हारी कन्या ने मेरे भोग का तिरस्कार कर पति को देखने के लिए शीघ्रता से प्रस्थान किया। इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया। अब वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करे और फिर यहाँ लौट आए। तब उसे अवश्य ही अपने पति का सुख प्राप्त होगा—इसमें तनिक भी संदेह नहीं।
आकाश से प्रसारित यह जीवनदायी वाणी सुनते ही वणिक-कन्या कलावती शीघ्रता से घर गई और वहाँ पहुँचकर भक्तिभाव से प्रसाद ग्रहण किया। प्रसाद लेने के बाद जब वह पुनः तट पर लौटी, तो उसने अपने पति, नाव और समस्त बंधु-बांधवों को यथावत् खड़ा पाया। यह दृश्य देखकर वह अत्यन्त प्रसन्न हो गई।
व्यापारी ने विधिपूर्वक सत्यनारायण भगवान की पूजा की और धन-रत्न सहित समस्त बंधुओं के साथ अपने घर लौट आया। तदनन्तर वह प्रत्येक संक्रांति और पूर्णिमा के दिन श्रद्धापूर्वक सत्यनारायण व्रत करता और Satyanarayan Bhagwan Ki Katha सुनता हुआ इस लोक में सुख भोगता रहा और अंत में दिव्य सत्यपुर को प्राप्त हुआ।