आश्चर्य की बात यह थी कि राजा और समस्त जनता Narad Muni जी को उनके सामान्य रूप में देख रहे थे, जबकि राजकुमारी और भगवान शिव के दो पार्षद नारद जी के इस विचित्र रूप को देख रहे थे। राजकुमारी ने जयमाला उठाई और आगे बढ़ी, लेकिन जैसे ही उसकी दृष्टि Narad Muni जी पर पड़ी, वह दूसरी दिशा में चली गई और सोचने लगी, “इस बंदर को यहाँ किसने बैठा दिया?”
Narad Muni जी जहाँ भी जाते, राजा वहीं खड़े हो जाते। नारद जी व्याकुल हो उठे कि राजकुमारी उन्हें देख भी नहीं रही थी। उन्हें यह भी एहसास नहीं हुआ कि उनका स्वरूप बदल गया है। वे सोच रहे थे, “मुझे तो हरि का रूप मिला है, फिर राजकुमारी मुझे स्वीकार क्यों नहीं कर रही?”
तभी उन्होंने देखा—श्यामवर्ण, कमल-नेत्र, किशोर अवस्था में अति सुंदर भगवान श्रीहरि स्वयं राजकुमार के रूप में प्रकट हुए औरराजकुमारी ने उनके गले में माला डाल दी। यह दृश्य देखकर Narad Muni जी को ऐसा लगा मानो उनका जीवन समाप्त हो गया हो।
उन्होंने मन ही मन सोचा, भगवान को अभी आकर मेरी राजकुमारी को छीनने की क्या आवश्यकता थी?”
भगवान शिव के पार्षदों ने Narad Muni जी से कहा, “अपने स्वरूप को देखिए। जल में अपना प्रतिबिंब देखिए।”
जैसे ही Narad Muni जी ने जल में अपना प्रतिबिंब देखा, वे अत्यंत क्रोधित हो उठे और बोले, “हे भगवान! मैंने जीवनभर आपकी भक्ति की, केवल राजकुमारी को प्राप्त करने का वरदान मांगा था, और आपने मुझे ठग लिया! जाओ, मैं तुम्हें श्राप देता हूँ—जैसे मैं अपनी स्त्री के वियोग में दुखी हूँ, वैसे ही तुम भी अपनी स्त्री के वियोग में दुखी रहोगे! जैसे मुझे बंदर का स्वरूप दिया गया, वैसे ही अब एक बंदर ही तुम्हारी सहायता करेगा!”
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥
तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥
जब भगवान ने अपनी माया को हटा लिया, तब वहाँ न लक्ष्मी ही रह गईं, न राजकुमारी ही। तब मुनि ने अत्यंत भयभीत होकर हरि के चरण पकड़ लिए और कहा – हे शरणागत के दुःखों को हरनेवाले! मेरी रक्षा कीजिए।
भगवान ने कहा, “नारद, अब जाओ और भगवान शंकर से मिलो। उन्होंने तुम्हें पहले ही चेतावनी दी थी, लेकिन तुमने उसे अनदेखा कर दिया।”
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरत बिश्रामा॥
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥
भगवान ने कहा, “जाकर भगवान शंकर के शतनाम का जप करो, तुम्हारे हृदय को तुरंत शांति मिलेगी। शिव के समान मुझे कोई प्रिय नहीं है, इस विश्वास को कभी मत छोड़ना।”