Maa Bhuvaneshwari Temple: जहां नमक की बोरी में प्रकट हुई थी देवी

The ancient sacred Pindi of Maa Bhuvaneshwari at her Siddhpeeth temple near Kotdwar, Pauri Garhwal. A powerful spiritual destination for devotees

क्या आप कोटद्वार के आसपास ऐसा कोई धार्मिक स्थल ढूंढ रहे हैं जहां इतिहास और आस्था का अनूठा संगम हो? अगर हां, तो पौड़ी गढ़वाल के प्रसिद्ध स्थलों (Pauri Garhwal famous places) में शुमार माँ भुवनेश्वरी मंदिर (Maa Bhuvaneshwari Temple) आपके लिए एक आदर्श गंतव्य है। यह सिर्फ एक कोटद्वार के नजदीक मंदिर (temple near Kotdwar) ही नहीं, बल्कि एक सिद्धपीठ है, जहां देवी ने एक अनोखे रूप में – नमक की बोरी के भीतर – प्रकट होकर अपने भक्तों को चमत्कार से हैरान कर दिया था।

माँ भुवनेश्वरी देवी हिन्दू धर्म में आदि शक्ति (Adi Shakti) के रूप में पूजी जाती हैं। संस्कृत में “भुवनेश्वरी” का अर्थ है “संसार (भुवन) की अधिपति देवी” – यानी ब्रह्मांड की साम्राज्ञी, जो समस्त सृष्टि को नियंत्रित करती हैं। वह महादेवी, पार्वती, दुर्गा और दस महाविद्याओं में एक प्रमुख रूप मानी जाती हैं।

Maa Bhuvaneshwari Temple उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के बिलखेत क्षेत्र में, सतपुली से लगभग 8 किलोमीटर दूर सांगुड़ा गाँव में स्थित है। यह मंदिर नारद (नयार) गंगा के पावन तट पर बसा हुआ है और इसे आदि शक्ति माँ भुवनेश्वरी सिद्धपीठ के रूप में जाना जाता है।

प्राचीन काल में जब उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कें नहीं थीं, तब पहाड़ों के लोग पैदल यात्रा कर नजीबाबाद, कोटद्वार और दुगड्डा जैसी प्रसिद्ध मंडियों तक जाते थे। उस समय केवल नमक और गुड़ ही बाहर से लाया जाता था, क्योंकि बाकी सभी खाद्य सामग्री लोग अपने खेतों में स्वयं उगाते थे।

उस समय का नमक आज जैसा पिसा हुआ नहीं, बल्कि डले वाला नमक (stone type salt) होता था, जो गुजरात और बंगाल की खाड़ी से आता था। इन यात्राओं को करने वाले लोगों को “ढाकर” कहा जाता था। ढाकर लोग रास्ते में जिन स्थानों पर ठहरते थे, वहाँ भोजन बनाने के बर्तन पहले से रखे जाते थे।

इसी परंपरा के अनुसार सैनार  गाँव के मौथा नेगी अपने सात भाइयों के साथ पैदल नजीबाबाद गए। वहीं नमक की बोरी में माँ भुवनेश्वरी अपनी दिव्य इच्छा से पिंडी रूप में प्रकट हुईं। जब यह बोरी वर्तमान मंदिर स्थल पर रखी गई, तो वह अत्यंत भारी हो गई और उठाई नहीं जा सकी। उसी रात माँ ने स्वप्न में दर्शन देकर अपनी स्थापना का आदेश दिया।

21 मार्च 1757 को विधि-विधान से माँ की पिंडी की स्थापना की गई। जिस भूमि पर मंदिर बना, वह माणियारी रावत की थी, जिसे आज भी माँ का ससुराल माना जाता है, जबकि नेगी वंश को माँ का मायका कहा जाता है।

उत्तराखंड की ऐसी ही एक और आश्चर्यजनक कथा मुंडेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी है, जहाँ गुड़ के थैले से शिवलिंग की प्राप्ति हुई थी।”

Route Map: Kotdwar to Maa Bhuvaneshwari Temple (65 KM)

Kotdwar → Dugadda → Satpuli → Banghat → Bilkhet → Maa Bhuvaneshwari Temple

  • Kotdwar से Dugadda – पहला बड़ा बाजार

  • Dugadda से Satpuli – मुख्य कस्बा

  • Satpuli से Gumkhal / Banghat मार्ग

  • Banghat से Bilkhet

  • Bilkhet से Maa Bhuvaneshwari Temple (सांगुड़ा गाँव)

कुल दूरी: लगभग 65 किलोमीटर
यात्रा समय: 2.5 से 3 घंटे (सड़क और मौसम पर निर्भर)

निष्कर्ष

अगर आप कोटद्वार के नजदीक के पर्यटन स्थल (places to visit near kotdwar) देखना चाहते हैं और गढ़वाल की प्राचीन लोक कथाओं व आस्था को करीब से महसूस करना चाहते हैं, तो माँ भुवनेश्वरी मंदिर (Maa Bhuvaneshwari Temple) की यात्रा जरूर करें। यह वो स्थान है जहां एक चमत्कार ने इतिहास रचा और आज भी भक्तों की अटूट श्रद्धा का केंद्र है।

जय आदि शक्ति माँ भुवनेश्वरी

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