Holi-होली का जन्म कैसे हुआ? पुराणों में छिपी अनसुनी कहानियां

Blazing fire of Holika Dahan where Holika was burned to ashes while devotee Prahlad remained unscathed due to his unwavering faith in Lord Vishnu, Falgun Purnima. Happy Holi

फाल्गुन की बयार ने रंग बरसाना शुरू कर दिया है। ढोलक की थाप, गुलाल की उड़ान और गुजिया की मिठास के बीच हम सब एक ऐसे त्योहार में खो जाते हैं, जिसे हम ‘होली’ (Holi) कहते हैं। लेकिन क्या आपने कभी ठहरकर सोचा है कि आखिर ये होलिका क्यों जलाई जाती है? सिर्फ इसलिए कि परंपरा है, या फिर इस आग में कोई वह रहस्य भी है, जो आपके भीतर झाँकने को मजबूर कर दे?

Holi केवल बहार का त्योहार नहीं है; यह अंदर की आग का भी त्योहार है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का सबसे प्राचीन, सबसे रोमांचक और सबसे दार्शनिक उदाहरण है। आइए, आज हम पुराणों के पन्नों को पलटें और होली की उन कहानियों को समझें, जिनका क्लाइमैक्स हमें सदियों से जोड़ रहा है, लेकिन शायद हम उसकी परतों में छिपे आध्यात्मिक संदेश को भूल गए हैं 

फाल्गुन की बयार ने रंग बरसाना शुरू कर दिया है। ढोलक की थाप, गुलाल की उड़ान और गुजिया की मिठास के बीच हम सब एक ऐसे त्योहार में खो जाते हैं, जिसे हम ‘होली’ कहते हैं। भारतीय त्योहारों की यही खासियत है – हर पर्व हमें कोई न कोई गहरी सीख देता है, ठीक वैसे ही जैसे नवरात्रि में मां दुर्गा की उपासना – हमें शक्ति और भक्ति का मार्ग दिखाती है।”

होली से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा भागवत पुराण और विष्णु पुराण में विस्तार से मिलती है . यह कहानी है हिरण्यकश्यप, प्रह्लाद और होलिका की।

हिरण्यकश्यप नाम का एक असुर राजा था। ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके उसने ऐसा वरदान मांग लिया कि वह लगभग अमर हो गया। उसे न दिन में मौत हो, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर; न किसी अस्त्र से, न किसी शस्त्र से; न किसी देवता से, न किसी मनुष्य से, न किसी पशु से। वरदान पाकर उसका अहंकार सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने स्वयं को ही ईश्वर घोषित कर दिया और आदेश दे दिया कि उसके राज्य में कोई भगवान विष्णु का नाम नहीं लेगा .

लेकिन विधि का विधान कुछ और ही था। उसके अपने पुत्र प्रह्लाद ने पिता के आदेश की परवाह न करते हुए भगवान विष्णु की भक्ति में ही अपना जीवन समर्पित कर दिया। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को अनगिनत यातनाएं दीं। विषधर सांपों के सामने छोड़ा गया, हाथियों के पैरों तले कुचलवाना चाहा, पर्वत से नीचे फेंकवाया गया, परंतु प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ .

अपनी असफलता से क्षुब्ध होकर, हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका का सहारा लिया। होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में कभी नहीं जल सकती। उसने प्रह्लाद को गोद में लिया और धधकती चिता में बैठ गई। उसे पूरा विश्वास था कि प्रह्लाद जलकर भस्म हो जाएगा और वह सकुशल बाहर निकल आएगी .

परंतु Holi की असली कहानी यहीं छिपी है। यह केवल आग की परीक्षा नहीं थी, यह आस्था की परीक्षा थी। जैसे ही आग लगी, वरदान पलट गया। होलिका तो जलकर राख हो गई, लेकिन भक्त प्रह्लाद बिल्कुल सुरक्षित बाहर निकल आए। यह घटना थी बुराई पर अच्छाई की जीत, अहंकार पर भक्ति की जीत, और अधर्म पर धर्म की जीत

Holi की आग में जलता और कौन? (Beyond Prahlad: The Other Legends)

प्रह्लाद की यह कथा सबसे प्रचलित है, लेकिन पुराणों में होली (Holi) के जन्म की और भी गाथाएं बिखरी हैं, जिन्हें जानना आवश्यक है:

1. राक्षसी ढुंढी का अंत (The Tale of Dhundi):

रघुवंश के राजा रघु के राज्य में ढुंढी नाम की एक राक्षसी ने आतंक मचा रखा था। उसने भगवान शिव से वरदान पा रखा था कि कोई देवता, दैत्य या शस्त्र उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकता। लेकिन वरदान देते समय शिव जी ने एक कमजोरी छोड़ दी थी। वह कमजोरी थी – बच्चों का शोर-गुल और हुड़दंग। महर्षि वशिष्ठ की सलाह पर फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सभी बच्चों ने इकट्ठा होकर लकड़ियों का ढेर लगाया, उसमें आग लगाई और जोर-जोर से शोर मचाना, नाचना-गाना शुरू कर दिया। इसी शोर और अग्नि के बीच राक्षसी ढुंढी का अंत हो गया .

2. कामदेव का बलिदान (Sacrifice of Kamadeva):

एक अन्य कथा शिव और पार्वती से जुड़ी है। तारकासुर नामक राक्षस का वध केवल शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा ही संभव था। देवताओं ने कामदेव से प्रार्थना की कि वे शिव जी की तपस्या भंग करें और उनके मन में पार्वती के प्रति प्रेम जगाएं। कामदेव ने वसंत ऋतु का सहारा लिया और फाल्गुन मास में शिव जी पर अपने बाण चलाए। उनकी तपस्या भंग हुई, लेकिन शिव जी ने क्रोधित होकर अपनी तीसरी आंख खोल दी और कामदेव को भस्म कर दिया। यह घटना होलिका दहन के आसपास ही मानी जाती है। इस दिन को कामदहन के नाम से भी जाना जाता है। बाद में शिव जी ने कामदेव को पुनर्जीवित तो किया, लेकिन यह दिन इच्छाओं पर नियंत्रण और त्याग का संदेश देता है .

3. पूतना का वध (Slaying of Putana):

भागवत पुराण में वर्णित एक अन्य कथा के अनुसार, कंस ने शिशु कृष्ण को मारने के लिए पूतना नामक राक्षसी को भेजा। पूतना ने अपने विषैले स्तन से कृष्ण को दूध पिलाने की कोशिश की, लेकिन कृष्ण ने उसे इसके बदले अपना प्राण ले लिया। इस घटना से गोकुल में खुशी मनाई गई। कुछ मान्यताओं के अनुसार, उसी खुशी में रासलीला और रंग खेलने की परंपरा शुरू हुई

क्या आपकी होलिका भी जलती है? (The Spiritual & Social Mirror)

अब थोड़ा ठहरकर खुद से पूछिए। हर साल हम लकड़ियों का ढेर लगाकर होलिका जलाते हैं, लेकिन क्या हमने कभी अपने भीतर बैठी ‘होलिका’ को जलाया है?

होलिका दहन का आध्यात्मिक अर्थ केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का संकल्प है . होलिका प्रतीक है हमारे भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष का। प्रह्लाद प्रतीक हैं हमारे भीतर के सत्य, श्रद्धा और सकारात्मक ऊर्जा के।

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: फाल्गुन में सर्दी समाप्त होती है और गर्मी शुरू होती है। इस मौसम में वातावरण में बैक्टीरिया पनपने लगते हैं। अग्नि में परिक्रमा करने और उसकी राख को शरीर पर लगाने से शुद्धि होती है। यह एक प्राचीन वैज्ञानिक परंपरा है जो हमारे पूर्वजों ने हमें दी .

  • सामाजिक दृष्टिकोण: Holi का दिन वह दिन है जब जाति, धर्म, अमीरी-गरीबी की सारी दीवारें ढह जाती हैं। लोग गले मिलते हैं, पुराने गिले-शिकवे भुलाते हैं और एक-दूसरे पर रंग डालकर समानता का संदेश देते हैं . यह सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

जब रंग बरसे ब्रज की गलियों में (Regional Colors of Holi)

Holi का स्वरूप सिर्फ एक नहीं है। हर क्षेत्र ने इसे अपनी संस्कृति से सजाया है:

  • ब्रज की होली: मथुरा-वृंदावन में होली महीनों तक चलती है। फूलों की होली, लट्ठमार होली (बरसाना), और छड़ी मार होली यहाँ की विशेष पहचान है .

  • बंगाल की होली: यहाँ इसे ‘डोल पूर्णिमा’ या ‘बसंत उत्सव’ कहा जाता है, जिसे रवींद्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन में एक सांस्कृतिक पर्व का रूप दिया .

  • बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश: यहाँ होली को ‘फगुआ’ कहा जाता है और ढोलक पर पारंपरिक गीतों के साथ इसे धूमधाम से मनाया जाता है।

होलिका दहन की विधि और आपका संकल्प (Rituals & Resolution)

होलिका दहन सिर्फ आग लगाने का नाम नहीं है। इसे सही विधि से करने का अपना महत्व है:

  1. सामग्री इकट्ठा करें: गोबर से बनी होलिका और प्रह्लाद की प्रतिमाएं, रोली, मौली (कच्चा सूत), साबुत हल्दी, फूल, गुलाल और नए अनाज (गेहूं की बालियां) .

  2. पूजा करें: शुभ मुहूर्त में पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। सबसे पहले गणेश जी और नरसिंह भगवान का स्मरण करें।

  3. परिक्रमा और संकल्प: होलिका में कच्चे सूत (मौली) को लपेटते हुए 3 या 7 बार परिक्रमा करें। इस दौरान संकल्प लें कि आप अपने मन के विकार – क्रोध, लोभ, अहंकार – को इस आग में जलाकर भस्म कर रहे हैं। यह संकल्प ही असली होलिका दहन है। .

  4. अग्नि प्रज्वलन: अंत में गुलाल अर्पित कर जल चढ़ाएं और होलिका को आग लगाएं। अगले दिन इसकी राख को घर लाना और लगाना बहुत शुभ माना जाता है 

Upasanhaar (Conclusion): क्या हम सच में 'प्रह्लाद' हैं?

Holi का यह पर्व हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न पर सोचने के लिए विवश करता है। हमारे भीतर भी कोई हिरण्यकश्यप तो नहीं बैठा जो हमें सिर्फ भौतिक सुखों की पूजा करने के लिए उकसाता है? क्या हमारा अहंकार हमारे विवेक (प्रह्लाद) को मारने की कोशिश तो नहीं कर रहा?

यदि होली सिर्फ रंगों तक सीमित रह गई, तो यह अधूरी है। सच्ची होली वह है, जब हम अपने भीतर के द्वेष की होलिका जलाकर, प्रेम और उल्लास के रंग में सराबोर हो जाएं। जब हम एक-दूसरे के प्रति सद्भावना का गुलाल लगाएं। जब हमारा हृदय प्रह्लाद की तरह श्रद्धा और आस्था से भरा हो।

इस होली, सिर्फ रंगों से नहीं, बल्कि संकल्प से सजिए। होलिका की आग में अपनी बुराइयों को झोंक दीजिए और बाहर निकलिए प्रह्लाद की तरह – शुद्ध, सत्य और श्रद्धा से परिपूर्ण।

आपको अपने जीवन की सबसे बड़ी ‘होलिका’ क्या लगती है, जिसे आप इस बार जलाना चाहेंगे? नीचे कमेंट में जरूर बताएं।

Happy and Thoughtful Holi

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