व्रत और त्योहार

Guru Gobind Singh Ji के नन्हें बेटों को जिंदा दीवार में क्यों चुनवाया गया?

Guru Gobind Singh — सिर्फ एक नाम नहीं, बलिदान, वीरता और आध्यात्मिक क्रांति की एक जीती-जागती मिसाल। सिखों के दसवें गुरु, 10th Guru, जिन्होंने न सिर्फ खालसा पंथ की नींव रखी, बल्कि धर्म और न्याय के लिए अपने पूरे परिवार की आहुति देकर मानवता को “सर्वस्व अर्पण” का असली अर्थ सिखाया। यह कहानी है उन शख्सियत की, जिसने इतिहास के पन्नों को अपने लहू से लिखा।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने कहा था – 

चिड़ियों से मैं बाज़ लड़ाऊँ, गीदड़ों को मैं शेर बनाऊँ। 

सवा लाख से एक लड़ाऊँ, तबै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ।

बचपन का आघात और एक योद्धा का उदय

Guru Gobind Singh Ji महज नौ वर्ष के थे, जब उनके पिता, गुरु तेग बहादुर जी का कटा सिर अंतिम संस्कार के लिए आनंदपुर साहिब (वर्तमान में रोपड़ जिला, पंजाब) लाया गया। पिता की शहादत ने एक बच्चे के मन पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि अगले 33 वर्षों तक, यानी अपने 42 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल तक, उनका हर कर्म, हर निर्णय धर्म और न्याय की रक्षा के प्रति समर्पित रहा।

इतिहास में Shree Guru Gobind Singh Ji की जो छवि उभरती है, वह एक लंबे कद, तेजस्वी चेहरे, उत्तम वस्त्रों और अनेक शस्त्रों से सुसज्जित एक संपूर्ण योद्धा-गुरु की है। चित्रों में वह हमेशा अपने बाएं हाथ पर एक सफेद बाज (बाज़) और पगड़ी में एक कलगी धारण किए दिखते हैं। यह प्रतीकात्मक रूप से उनकी दूरदृष्टि, शक्ति और राजसी गरिमा को दर्शाता है।

उन्नीस वर्ष की आयु तक, उन्होंने स्वयं को भावी संघर्षों के लिए तैयार किया।  इस दौरान गुरु जी ने संस्कृत और फारसी की शिक्षा ग्रहण की। हिंदी और पंजाबी तो उन्हें पहले से ही आती थी। उन्होंने घुड़सवारी, तीरंदाजी और बंदूक चलाने में निपुणता हासिल की और शिकार को भी अपनी कौशल वृद्धि का माध्यम बनाया।

लेकिन वह सिर्फ एक योद्धा ही नहीं थे। उन्होंने सीखी हुई चारों भाषाओं – संस्कृत, फारसी, हिंदी और पंजाबी – में कविताएँ लिखनी शुरू कर दीं। आश्चर्यजनक बात यह है कि कभी-कभी वे एक ही कविता में इन चारों भाषाओं का प्रयोग करते थे। उन्होंने हिंदू धर्मशास्त्र की अनेक कथाओं को अपने अनूठे अंदाज़ में पुनर्लिखा। उनकी दयालुता का एक प्रसंग प्रसिद्ध है: कहा जाता है कि उनके तीरों की नोक सोने की होती थी, ताकि युद्ध में मारे गए व्यक्ति के परिवार को आर्थिक सहायता मिल सके।

पहली चुनौती और 'पंज प्यारे' का ऐतिहासिक सृजन

Guru Gobind Singh को पहली बड़ी चुनौती उनके पड़ोसी पहाड़ी राज्य बिलासपुर (वर्तमान हिमाचल प्रदेश) के राजा भीम चंद से मिली। गुरु जी की बढ़ती लोकप्रियता और एक बार हाथी देने से इनकार करने पर नाराज़ भीम चंद ने आनंदपुर साहिब पर हमला किया, पर उसे हार का सामना करना पड़ा।

फिर आया वह ऐतिहासिक दिन – सन 1699 की बैसाखी। गुरु जी ने सभी सिखों को आनंदपुर साहिब में एकत्र होने का संदेश भेजा। विशाल भीड़ के समक्ष, उन्होंने अचानक अपनी तलवार निकाली और घोषणा की – “मुझे एक ऐसे शीश की आवश्यकता है, जो धर्म के लिए बलिदान हो सके।”

एक सन्नाटा छा गया। फिर, लाहौर के दयाराम आगे आए। गुरु जी उन्हें एक तम्बू के अंदर ले गए। कुछ देर बाद जब गुरु जी बाहर आए, तो उनकी तलवार से खून टपक रहा था! फिर भी, दूसरा व्यक्ति, दिल्ली के धर्मदास आगे आया। उसके बाद, द्वारका के मोहकम चंद, जगन्नाथ के हिम्मत राय और बीदर के साहिब चंद ने भी अपना शीश अर्पित करने का साहस दिखाया।

तभी, चमत्कार हुआ। Guru Gobind Singh जी उन पाँचों जीवित सिखों के साथ बाहर आए, जो केसरिया वस्त्र और पगड़ी पहने हुए थे। भीड़ को समझ आया – यह एक परीक्षा थी, सच्ची निष्ठा और बलिदान की भावना की कसौटी। गुरु जी ने उन पांचों को ‘पंज प्यारे’ (प्यारे पांच) का खिताब दिया। उनके हिंदू नाम बदलकर सभी के नाम के साथ ‘सिंह’ (शेर) जोड़ा गया। इसी दिन खालसा पंथ की स्थापना हुई।

खुशवंत सिंह लिखते हैं कि गुरु जी ने उन्हें पांच ककार धारण करने का आदेश दिया:

  1. केश – बाल न काटने।

  2. कंघा – बाल सँवारने के लिए कंघा।

  3. कड़ा – दाहिने हाथ में लोहे का कड़ा।

  4. कृपाण– हमेशा अपने साथ एक तलवार रखना।

  5. कच्छेरा – घुटने तक लंबा विशेष अंडरवियर।

इसके अलावा, उन्हें तंबाकू से दूर रहने और मुस्लिम महिलाओं की इज्जत करने की सख्त हिदायत दी गई।

औरंगजेब का षड्यंत्र और आनंदपुर का महासंग्राम

1701 से 1704 के बीच, सिखों और पहाड़ी राजाओं के बीच लगातार झड़पें होती रहीं। अंततः बिलासपुर के राजा भीम चंद के पुत्र और उत्तराधिकारी अजमेर चंद ने दक्षिण जाकर मुगल बादशाह औरंगजेब से मिलकर Guru Gobind Singh की “समस्या” को सदा के लिए खत्म करने की अपील की।

औरंगजेब ने दिल्ली, सरहंद और लाहौर के अपने गवर्नरों को आदेश दिए कि गुरु जी को नियंत्रित करने के लिए अपनी पूरी सेना झोंक दें। आदेश में कहा गया कि पहाड़ी राजाओं की सेना भी मुगल सेना के साथ मिलकर लड़ेगी और गुरु जी को बादशाह के सामने पेश करेगी।

गुरु जी ने अपनी सेना को छह भागों में बांटा। पांच टुकड़ियों को पांच किलों की रक्षा की जिम्मेदारी दी गई और छठी को रिजर्व रखा गया।  गुरु जी ने अपने सभी जनरलों को बताया कि मुगल सेना संख्या में कहीं अधिक है, इसलिए खुले मैदान में लड़ना बुद्धिमानी नहीं होगी। बेहतर रणनीति यह होगी कि हम अपने किलों के भीतर रहकर उनसे लड़ें।

मुगल सेना ने उफनते समुद्र की तरह आनंदपुर साहिब पर हमला बोल दिया। पाँचों किलों से सिख तोपचियों ने उस इलाके को निशाना बनाया जहाँ मुगल सैनिकों की भारी संख्या जमा थी। मुगल सैनिकों ने सिखों की तोपों का मुंह बंद करने की कोशिश की, लेकिन जब भी वे किलों की ओर बढ़ते, सिख बंदूकधारी उन पर सटीक निशाना लगाते।

खुले में लड़ रहे मुगल सैनिकों का भारी नुकसान हो रहा था। यह देखकर, ऊदय सिंह और देई सिंह के नेतृत्व में सिख सैनिक किले से बाहर निकल आए और मुगल सेना पर टूट पड़े। अगले दिन गुरु गोबिंद सिंह जी स्वयं लड़ाई में कूद पड़े। उन्हें पहचानकर मुगल सेनापतियों वजीर खान और जबर्दस्त खान ने ऐलान किया कि जो भी गुरु पर वार करेगा, उसे बड़ा इनाम दिया जाएगा। दूसरे दिन की लड़ाई समाप्त होते-होते, गुरु जी और उनके सैनिकों ने भारी तबाही मचाई और सैकड़ों घोड़े व मुगल सैनिक धराशायी हो गए।

घेराबंदी, छल और भीषण नुकसान

मुगलों को एहसास हुआ कि सिखों को हराने का एकमात्र तरीका है – उनके किलों की घेराबंदी कर देना। ताकि रसद न पहुंचने के कारण, भूख से पीड़ित होकर वे आत्मसमर्पण कर दें।

धीरे-धीरे किले की रसद समाप्त होने लगी। किले के अंदर भुखमरी की नौबत आ गई। अजमेर चंद ने गुरु जी के पास एक पत्र भेजा, जिसमें कहा गया कि अगर Guru Gobind Singh जी अपने साथियों के साथ आनंदपुर छोड़ देते हैं, तो उन्हें बिना रोक-टोक जाने दिया जाएगा। गुरु जी को इस प्रस्ताव में कुछ संदेह था, लेकिन उनकी माता माता गुजरी जी ने उन्हें समझाया कि ऐसा करके वे कई लोगों की जान बचा सकते हैं।

गुरु जी ने शर्त रखी कि इससे पहले कि वे प्रस्ताव स्वीकार करें, वह मुगलों और राजाओं की नीयत की परीक्षा लेना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उनके मूल्यवान सामान को बैलगाड़ियों के काफिले में पहले बाहर भेजा जाए। मुगल इसके लिए तैयार हो गए।

Guru Gobind Singh जी ने आनंदपुर के लोगों से अपना सारा बेकार सामान जमा करने को कहा। थोड़ी ही देर में वहाँ पुराने जूते, फटे कपड़े, टूटे बर्तन और जानवरों की हड्डियों का ढेर लग गया। इन सबको कीमती थैलों में भरकर बैलगाड़ियों पर लाद दिया गया। हर गाड़ी पर मशाल जलाई गई ताकि दुश्मन का ध्यान इस “कीमती सामान” पर जाए।

बैलगाड़ियों का काफिला अंधेरी रात में किले से निकला। जैसे ही वह मुगल सेना की पहुँच में पहुँचा, थैलों को लूट लिया गया। सुबह जब थैले खोले गए, तो मुगल सैनिकों के होश उड़ गए – अंदर से सिर्फ कूड़ा-करकट निकला। इस धोखे से मुगल भड़क गए, लेकिन तब तक Guru Gobind Singh Ji और उनका काफिला आनंदपुर छोड़ चुका था।

चार साहिबजादों का अमर बलिदान: इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय

मुगलों ने वादे का पालन नहीं किया। सरसा नदी के किनारे (वर्तमान में पंजाब-हरियाणा बॉर्डर), मुगल सेना ने सिख काफिले पर हमला बोल दिया। इस भीषण लड़ाई में कई लोग मारे गए और बिछड़ गए। गुरु गोबिंद सिंह जी की माता, माता गुजरी, और उनके दो छोटे साहिबजादे – ज़ोरावर सिंह (9 वर्ष) और फ़तेह सिंह (7 वर्ष) – उनसे अलग हो गए।

गुरु जी के साथ उनके सैनिकों की संख्या पांच सौ से घटकर मात्र चालीस रह गई। वे इन सैनिकों और अपने दो बड़े साहिबजादों – अजीत सिंह और जुझार सिंह – के साथ चमकौर की गढ़ी (वर्तमान पंजाब) पहुँचने में सफल हुए। यहाँ हुई ऐतिहासिक लड़ाई में, चालीस सिखों ने हजारों मुगल सैनिकों का बहादुरी से सामना किया। इसी लड़ाई में गुरु जी के दोनों बड़े साहिबजादों और दो पंज प्यारों ने वीरगति पाई।

आनंदपुर साहिब से बिछड़न और पकड़े जाने का दुर्भाग्य

1704 में आनंदपुर साहिब छोड़ने के बाद, सरसा नदी के किनारे हुए हमले में गुरु जी का परिवार बिखर गया। गुरु जी की माता माता गुजरी जी और उनके दोनों नन्हें साहिबज़ादे उनसे अलग हो गए। थके-हारे और भूखे-प्यासे, ये तीनों एक गांव में पहुंचे, जहां एक नौकर गंगू ने उन्हें अपने घर शरण दी। लेकिन लालच में आकर गंगू ने मुगलों को इन तीनों की मौजूदगी की सूचना दे दी।

मोरिंडा (वर्तमान पंजाब) के सूबेदार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन्हें सरहंद (वर्तमान फतेहगढ़ साहिब, पंजाब) के क्रूर गवर्नर वज़ीर खान के सामने पेश किया।

वज़ीर खान की धमकियाँ और साहिबज़ादों का दृढ़ संकल्प

वज़ीर खान ने दोनों नन्हें बच्चों को देखा। उसने सोचा कि इन बच्चों को डरा-धमकाकर या लालच देकर इस्लाम कबूल करवा लिया जाएगा, और इस तरह गुरु गोबिंद सिंह जी को मानसिक रूप से तोड़ा जा सकेगा।

उसने पहले मीठी बातें करने की कोशिश की, फिर डराने-धमकाने का रास्ता अपनाया। उसने कहा, “तुम दोनों छोटे हो। तुम्हारा पिता तुम्हें छोड़कर भाग गया है। अगर तुम इस्लाम कबूल कर लो, तो तुम्हें बादशाह औरंगजेब की ओर से ढेर सारे इनाम, महल और सम्मान मिलेंगे। तुम आराम से रहोगे।”

इस पर नन्हें फतेह सिंह जी ने निडरता से जवाब दिया, “हमारे पिता जी भागे नहीं हैं, वह धर्म के लिए लड़ रहे हैं। हमारे बड़े भाइयों ने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए। हम उनके पुत्र हैं, हम इस्लाम क्यों कबूल करें?”

कोठरी में कैद और माता गुजरी जी का सहारा

वज़ीर खान ने तीनों को एक सर्द और अंधेरी कोठरी में कैद कर दिया। सर्दियों की कड़ाके की ठंड में, बिना गर्म कपड़ों के, बूढ़ी दादी ने अपने नाती-पोतों को गर्मी देने के लिए उन्हें अपनी गोद में भर लिया और उनके साथ निरंतर गुरबाणी का पाठ करती रहीं। माता गुजरी जी ने उन्हें सिख इतिहास के वीरों की कहानियाँ सुनाईं और समझाया कि धर्म के लिए बलिदान देना ही सबसे बड़ी विजय है।

कई दिनों तक, वज़ीर खान ने तरह-तरह के लालच और धमकियाँ दीं। कभी नवाब बनाने का वादा, तो कभी मौत की धमकी। पर दोनों साहिबज़ादे एक स्वर में कहते, “हम अपना धर्म नहीं छोड़ेंगे। हमारे केश (बाल) किसी कीमत पर नहीं कटवाएंगे।”

अंतिम पेशी और अटल निर्णय

आखिरकार, निराश और क्रोधित वज़ीर खान ने उन्हें कोठरी से निकलवाकर अदालत में पेश किया। उसने कहा, “यह तुम्हारा आखिरी मौका है। इस्लाम कबूल करो या मौत के लिए तैयार हो जाओ।”

इस पर ज़ोरावर सिंह जी ने गर्व से सिर उठाकर कहा, “हम बचपन से ही सीखते आए हैं कि धर्म के लिए प्राण देना सौभाग्य की बात है। हम मौत से नहीं डरते। हमारे दादा जी (गुरु तेग बहादुर जी) ने भी धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश कटवा दिया था। हम उनके पोते हैं।”

दोनों बच्चों की अडिग आस्था देखकर पूरी अदालत दंग रह गई। वज़ीर खान का क्रोध सीमा पार कर गया।

क्रूर आदेश और शहादत का वीरतापूर्ण अंत

27 दिसंबर, 1704 (या पौराणिक मान्यताओं के अनुसार 26 दिसंबर) को, वज़ीर खान ने अपना क्रूर आदेश सुनाया: “चूंकि ये बच्चे इस्लाम कबूल करने से इनकार करते हैं, इसलिए इन्हें जिंदा दीवार में चुनवा दिया जाए।”

इस नृशंस आदेश को सुनकर भी दोनों साहिबज़ादों के चेहरे पर शांति और दृढ़ता थी। उन्होंने अपनी दादी माता गुजरी जी से विदा ली और बड़े ही साहस के साथ अपने शहीदी स्थल की ओर कदम बढ़ाए।

जल्लादों ने उन्हें खड़ा करके उनके चारों ओर ईंटें और गारा चुनना शुरू किया। जैसे-जैसे दीवार ऊंची होती गई, दोनों भाई एक-दूसरे का हाथ थामे, ‘वाहेगुरु‘ का जाप करते रहे। आखिरकार, दीवार उनके सिर के ऊपर तक पहुँच गई और उनके प्राणों ने उनके नन्हें शरीर को त्याग दिया। धर्म ने एक और विजय पाई; अधर्म ने अपनी क्रूरता का एक और काला अध्याय जोड़ा।

माता गुजरी जी का अंतिम सांसें और गुरु जी का दुःख

जब माता गुजरी जी को अपने प्यारे पोतों के इस वीरतापूर्ण बलिदान की खबर मिली, तो उनका हृदय टूट गया। वह इस गहरे सदमे को सहन नहीं कर पाईं और उन्होंने भी वहीं अपने प्राण त्याग दिए। इस तरह, एक ही दिन में, गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी माता और अपने दोनों छोटे पुत्रों को खो दिया।

जब यह समाचार गुरु गोबिंद सिंह जी तक पहुँचा, तो उन्होंने दुःख प्रकट करने के बजाय, वाहेगुरु का शुक्राना किया कि उनके बच्चों ने धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा, “मेरे साहिबज़ादों ने संसार को दिखा दिया कि बलिदान की आयु कोई मायने नहीं रखती, रखती है तो केवल आस्था की दृढ़ता।”

सोचने का बिंदु: आज के समय में, जब हम एक छोटी सी असुविधा या अपमान पर धैर्य खो देते हैं, तब 7 और 9 साल के इन बालकों का अटूट धैर्य, आस्था और साहस हमें क्या सिखाता है? क्या हम उन मूल्यों के लिए खड़े होने का साहस रखते हैं, जिन्हें हम सही मानते हैं?

अंतिम दिन और गुरु ग्रंथ साहिब को गुरुता

नांदेड़ (वर्तमान महाराष्ट्र) में रहते हुए, गुरु गोबिंद सिंह जी ने औरंगजेब को एक ज़बरदस्त फारसी पत्र (जफरनामा) लिखा, जिसमें उन्होंने उसके धोखे और अत्याचारों की कड़ी निंदा की। औरंगजेब ने समझौते का प्रस्ताव भेजा। गुरु जी जब उससे मिलने दक्षिण की ओर जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें औरंगजेब की मौत की खबर मिली।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद, उत्तराधिकार के संघर्ष में उसके पुत्र शहजादा मुअज्जम (जो बादशाह बहादुर शाह बना) ने गुरु जी से सहायता मांगी। गुरु जी ने उनकी सहायता की।

अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में, गुरु जी गोदावरी नदी के किनारे नांदेड़ में थे। 20 सितंबर, 1708 की शाम, जब वह विश्राम कर रहे थे, तभी दो घुसपैठिए जमशेद खान और वसील खान (जिन्हें वजीर खान ने भेजा था) ने छुरा भोंककर उन पर हमला किया। गुरु जी ने तत्काल अपनी किरपान से एक हमलावर को मार गिराया, दूसरा उनके साथियों के हाथों मारा गया।

गुरु जी के घाव को उनके एक साथी ने टांके लगाकर बंद किया, लेकिन कुछ दिनों बाद टांके खुल गए। 7 अक्टूबर, 1708 को, महज 42 वर्ष की आयु में, गुरु जी ने अपने अनुयायियों को बुलाया। उन्होंने ऐलान किया – “अब से, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी ही आपके गुरु हैं। सभी सिख उन्हें गुरु मानें।”

 Guru Gobind Singh जी ने ग्रंथ साहिब को खोलने को कहा, उनके सामने श्रद्धापूर्वक माथा टेका, पाँच पैसे और एक नारियल प्रसाद चढ़ाया। इस तरह, मानव रूप में दसवें गुरु ने गुरु की गद्दी सदा-सदा के लिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को सौंप दी।

निष्कर्ष: एक ऐसी विरासत जो चेतना को झकझोर दे

Guru Gobind Singh जी का जीवन केवल युद्धों और बलिदानों का इतिहास नहीं है। यह एक दर्शन है – उस दर्शन का, जो कहता है कि जब अन्याय हो, तो संत बनकर प्रार्थना करना ही काफी नहीं, बल्कि सिंह बनकर उसका प्रतिकार करना भी जरूरी है। यह उस प्रेम की कहानी है, जो अपने सब कुछ देकर भी विश्व को मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

आज, जब हम स्वार्थ और भौतिकतावाद में खोते जा रहे हैं, Guru Gobind Singh जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य सेवा, न्याय और सत्य के लिए अडिग रहना है। उन्होंने न सिर्फ एक पंथ गढ़ा, बल्कि मानवीय चरित्र की अदम्य ऊंचाइयों का एक ऐसा उदाहरण पेश किया, जो हर युग में मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।

 सच में, उन्होंने साधारण मनुष्यों को वीर योद्धा बनाकर, इतिहास की धारा ही बदल दी। उनका बलिदान व्यर्थ नहीं गया – आज खालसा पंथ दुनिया भर में न्याय, सेवा और समरसता का प्रतीक बनकर चमक रहा है।

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Venu Sharan

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