Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1

Bhagavad Gita with Lord Krishna and Arjuna on the Kurukshetra battlefield

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1: श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 1 – संपूर्ण अर्थ, कथा और शिक्षा

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे... गीता के पहले श्लोक का गहरा रहस्य, कहानी और जीवन के लिए संदेश

मूल श्लोक (संस्कृत) और Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 in Hindi

धृतराष्ट्र उवाच।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।१।।

🎧 श्लोक सुनें

दृश्य कल्पना: विशाल कुरुक्षेत्र का मैदान — एक ओर कौरवों की विशाल सेना खड़ी है, दूसरी ओर पाण्डवों की सेना। दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए आमने-सामने हैं। लेकिन युद्ध शुरू होने से पहले ही हस्तिनापुर के राजमहल में अंधे राजा धृतराष्ट्र के मन में एक प्रश्न उठता है, और वे अपने विश्वसनीय मन्त्री-सारथी संजय से यह प्रश्न पूछते हैं।

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 Meaning – सरल हिंदी में अर्थ

"हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्र कौरव और पाण्डु के पुत्र पाण्डव — उन्होंने क्या किया?"

यह प्रश्न धृतराष्ट्र ने अपने मन्त्री संजय से पूछा था, जो उनके विश्वसनीय सारथी भी थे। यही से Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 की पूरी कथा आरंभ होती है, जो आगे चलकर संजय द्वारा धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का पूरा वृत्तांत सुनाए जाने का माध्यम बनती है।

भूमिका: Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 क्यों महत्वपूर्ण है

श्रीमद्भगवद्गीता विश्व के सबसे पवित्र और गहन ग्रंथों में से एक है, और इसकी यात्रा शुरू होती है Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 से। यह पहला श्लोक केवल एक प्रश्न भर नहीं है, बल्कि पूरे महाभारत युद्ध की पृष्ठभूमि, मनुष्य के मन के भीतर छिपे भेदभाव और धर्म-अधर्म के संघर्ष को उजागर करने वाला द्वार है।

गीता के अठारह अध्यायों में से पहला अध्याय "अर्जुन विषाद योग" कहलाता है, और इसी अध्याय की नींव इसी पहले श्लोक पर टिकी है। जब तक हम यह न समझें कि धृतराष्ट्र के मन में क्या चल रहा था, तब तक हम अर्जुन की व्यथा, श्रीकृष्ण के उपदेश और पूरे युद्ध की गहराई को पूरी तरह नहीं समझ सकते। इसलिए संत और आचार्य सदियों से इस एक श्लोक पर घंटों प्रवचन करते आए हैं।

इस लेख में हम Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 Meaning को विस्तार से समझेंगे, साथ ही उस समय की पूरी कथा, संवाद और शिक्षाओं को भी जानेंगे जो इस श्लोक से जुड़ी हैं। यह पूरा लेख Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 in Hindi में सरल और रोचक भाषा में लिखा गया है, ताकि हर पाठक इसे आसानी से समझ सके — चाहे वह पहली बार गीता पढ़ रहा हो या वर्षों से इसका अध्ययन कर रहा हो।

यह श्लोक हमें बताता है कि किसी भी बड़ी घटना — चाहे वह युद्ध हो, पारिवारिक विवाद हो या समाज में फैली कलह — उसकी जड़ें अक्सर मनुष्य के मन के भीतर पहले से ही पल रहे भेदभाव और पक्षपात में छिपी होती हैं। धृतराष्ट्र का यह प्रश्न हमें उसी सूक्ष्म सत्य की ओर इशारा करता है।

धृतराष्ट्र और संजय का परिचय

इस श्लोक को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि धृतराष्ट्र और संजय कौन थे।

राजा धृतराष्ट्र

धृतराष्ट्र हस्तिनापुर के अंधे राजा थे। जन्म से नेत्रहीन होने के कारण राजगद्दी उनके छोटे भाई पाण्डु को सौंपी गई थी, लेकिन पाण्डु की असामयिक मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र ने राज्य का संचालन संभाला। उनके सौ पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा दुर्योधन था।

संजय — दिव्य दृष्टि वाले सारथी

संजय धृतराष्ट्र के मन्त्री और सारथी थे। महर्षि वेदव्यास ने संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की थी, जिसके माध्यम से वे हस्तिनापुर के राजमहल में बैठे-बैठे ही कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में घट रही हर घटना को देख और सुन सकते थे। इसी दिव्य दृष्टि के कारण संजय पूरे युद्ध का आँखों देखा हाल धृतराष्ट्र को सुनाने में सक्षम हुए, और यही संवाद संपूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता का आधार बना।

शब्दार्थ – श्लोक के प्रत्येक शब्द का अर्थ

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 in Hindi को और गहराई से समझने के लिए आइए इस श्लोक के हर शब्द का अर्थ जानें:

संस्कृत शब्द हिंदी अर्थ
धृतराष्ट्र उवाचधृतराष्ट्र ने कहा
धर्मक्षेत्रेधर्मभूमि में
कुरुक्षेत्रेकुरुक्षेत्र नामक स्थान में
समवेताःएकत्र हुए
युयुत्सवःयुद्ध की इच्छा रखने वाले
मामकाःमेरे पुत्र (कौरव)
पाण्डवाः च एवऔर पाण्डु के पुत्र भी
किम् अकुर्वतउन्होंने क्या किया
संजयहे संजय (संबोधन)

इस प्रकार शब्द-दर-शब्द अर्थ समझने से Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 Meaning और भी स्पष्ट हो जाता है — यह केवल एक सूचनात्मक प्रश्न नहीं, बल्कि धृतराष्ट्र की आंतरिक व्याकुलता और पक्षपात को भी उजागर करता है।

कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यों कहा गया?

कुरुक्षेत्र केवल युद्ध की भूमि नहीं थी — यह एक धर्मभूमि और तीर्थभूमि भी थी। मान्यता है कि यहाँ देवताओं ने यज्ञ किया था, और राजा कुरु ने भी इसी भूमि पर तपस्या की थी।

  • यज्ञ जैसे धर्ममय कार्यों और राजा कुरु की तपस्या के कारण इसे "धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र" कहा गया।
  • अर्थात ऐसी भूमि, जहाँ धर्ममय कार्यों से मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है।
  • इसलिए कुरुक्षेत्र केवल लड़ाई का मैदान नहीं, बल्कि ऐसी तीर्थभूमि थी जहाँ मनुष्य जीते-जी पवित्र कर्म करके अपना कल्याण कर सकता था।
  • इसी कारण युद्ध के लिए भी इस भूमि का चुनाव केवल संयोग से नहीं हुआ था — ऐसी भूमि चुनी गई जहाँ लौकिक और पारलौकिक, दोनों प्रकार का लाभ हो सके।
  • श्रेष्ठ पुरुषों की सम्मति लेकर युद्ध के लिए यह भूमि चुनी गई थी, ताकि युद्ध में मरने वालों का भी उद्धार हो सके और उनका कल्याण हो।

इस श्लोक से मिलने वाली जीवन शिक्षा

इस श्लोक से मनुष्य को एक बहुत बड़ी शिक्षा मिलती है:

  • जब भी जीवन में कोई कार्य करना हो, तो धर्म को सामने रखकर ही करना चाहिए।
  • हर कार्य केवल अपने सुख और आराम के लिए नहीं, बल्कि सबके हित की दृष्टि से करना चाहिए।
  • जब कर्तव्य और अकर्तव्य का प्रश्न सामने आए, तो शास्त्र को सामने रखना चाहिए।

युद्ध हुआ ही क्यों? सन्धि के प्रयास और दुर्योधन की जिद

अब प्रश्न उठता है — आखिर युद्ध की नौबत आई ही क्यों?

राजाओं द्वारा बार-बार सन्धि का प्रस्ताव रखा गया, लेकिन दुर्योधन ने सन्धि स्वीकार नहीं की। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं पाण्डवों की ओर से शान्ति का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर गए, लेकिन दुर्योधन ने तब भी युद्ध से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।

"बिना युद्ध के मैं पाण्डवों को तीखी सूई की नोक जितनी जमीन भी नहीं दूँगा।" — दुर्योधन

अन्ततः पाण्डव मजबूर होकर युद्ध के लिए तैयार हुए। इस प्रकार कौरव और पाण्डव दोनों अपनी-अपनी सेनाओं के साथ युद्ध की इच्छा से कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए, लेकिन दोनों की युद्ध के प्रति भावना एक जैसी नहीं थी।

दुर्योधन की युद्ध की इच्छा

दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए खड़ी थीं, लेकिन दुर्योधन में युद्ध की इच्छा विशेष रूप से प्रबल थी। उसका मुख्य उद्देश्य था — राज्य प्राप्त करना।

उसके लिए यह महत्वपूर्ण नहीं था कि:

  • राज्य धर्म से मिले या अधर्म से…
  • न्याय से मिले या अन्याय से…
  • विहित रीति से मिले या निषिद्ध रीति से…

उसकी भावना थी — "किसी भी तरह राज्य हमें मिलना चाहिए।" इसी कारण विशेष रूप से दुर्योधन का पक्ष युद्ध के लिए अधिक इच्छुक था।

पाण्डवों की धर्म-प्रधान भावना

इसके विपरीत, पाण्डवों के जीवन में धर्म की प्रधानता थी। उनका भाव था — "हम चाहे जैसा जीवन निर्वाह कर लेंगे, लेकिन अपने धर्म में बाधा नहीं आने देंगे। धर्म के विरुद्ध नहीं चलेंगे।"

इसी कारण महाराज युधिष्ठिर स्वयं युद्ध नहीं करना चाहते थे। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि धर्मराज युधिष्ठिर युद्ध के लिए तैयार हुए? इसके पीछे भी धर्म ही कारण था — जिस माता की आज्ञा से युधिष्ठिर ने अपने चारों भाइयों के साथ द्रौपदी से विवाह किया था, उसी माता की आज्ञा के कारण युधिष्ठिर युद्ध में प्रवृत्त हुए।

अर्थात — युधिष्ठिर की युद्ध में प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण नहीं, बल्कि माता की आज्ञा का पालन करने वाले धर्म के कारण हुई।

माता कुन्ती का दृष्टिकोण – युद्ध की आज्ञा क्यों दी?

माता कुन्ती अत्यन्त सहिष्णु थीं। उन्हें कष्ट से बचकर सुख, आराम और राज्य प्राप्त करने की लालसा नहीं थी। वह ऐसी विलक्षण माता थीं, जिन्होंने भगवान से भी विपत्तियों का वरदान माँगा था। उनमें सुख की लालसा नहीं थी, लेकिन उनके मन में दो बातों को लेकर बहुत दुःख था:

पहली बात — द्रौपदी का अपमान

राज्य के लिए कौरव और पाण्डव आपस में लड़ते, चाहे जो करते — लेकिन दुर्योधन आदि ने सभा में उनकी प्यारी पुत्रवधू द्रौपदी को नग्न करने और अपमानित करने का प्रयास किया। कुन्ती को यह घृणित चेष्टा बहुत बुरी लगी। उनके लिए यह केवल पारिवारिक विवाद नहीं था — यह मनुष्यता के विरुद्ध था।

दूसरी बात — भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास

जब भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों की ओर से सन्धि का प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर पहुँचे, तब दुर्योधन, दुःशासन, कर्ण और शकुनि आदि ने भगवान श्रीकृष्ण को पकड़कर कैद करने का प्रयास किया। यह बात सुनकर माता कुन्ती के मन में विचार आया — अब इन दुष्टों का शीघ्र अंत होना चाहिए, क्योंकि उनके जीवित रहने से उनके पाप बढ़ते ही चले जाएंगे और इससे अंततः उनका ही बहुत नुकसान होगा।

इन्हीं दो कारणों से माता कुन्ती ने पाण्डवों को युद्ध के लिए आज्ञा दी थी।

पाण्डव धृतराष्ट्र की आज्ञा क्यों मानते थे?

पाण्डव धृतराष्ट्र को अपने पिता के बड़े भाई होने के कारण पिता के समान मानते थे। वे उनकी आज्ञा का पालन करते थे। यहाँ तक कि यदि धृतराष्ट्र अनुचित आज्ञा भी देते, तब भी पाण्डव उचित-अनुचित का विचार किए बिना उनकी आज्ञा का पालन करते थे।

लेकिन धृतराष्ट्र के मन में पाण्डवों के प्रति वही भावना नहीं थी। और यही बात इस पहले श्लोक के एक छोटे-से शब्द में दिखाई देती है।

"मामकाः" और "पाण्डवाः" – दो शब्दों का गहरा रहस्य

धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों के लिए कहा — "मामकाः" अर्थात मेरे पुत्र। और पाण्डु के पुत्रों के लिए कहा — "पाण्डवाः" अर्थात पाण्डु के पुत्र।

ध्यान दीजिए — अपने पुत्रों के लिए "मेरे", और पाण्डवों के लिए "पाण्डु के"। क्यों? क्योंकि मनुष्य के भीतर जो भाव होते हैं, वे प्रायः उसकी वाणी से बाहर निकल ही जाते हैं।

धृतराष्ट्र के मन में द्वैधीभाव था — "दुर्योधन आदि मेरे पुत्र हैं, और युधिष्ठिर आदि मेरे पुत्र नहीं, बल्कि पाण्डु के पुत्र हैं।"

द्वैधीभाव का विनाशकारी परिणाम

यही द्वैधीभाव आगे चलकर विनाश का कारण बना। मनुष्य जब यह सोचने लगता है — "ये अपने हैं और ये दूसरे हैं…" तो प्रेम और स्नेह कम होने लगता है, और उसकी जगह पैदा होती है — कलह।

इसलिए मनुष्य को अपने घर में, मुहल्ले में, गाँव में, प्रान्त में, देश में और अलग-अलग सम्प्रदायों में भी — "ये अपने हैं, ये दूसरे हैं" — ऐसा द्वैधीभाव नहीं रखना चाहिए। क्योंकि द्वैधीभाव से आपस में प्रेम और स्नेह नहीं बढ़ता, बल्कि कलह पैदा होती है।

धृतराष्ट्र के पक्षपात ने क्या-क्या कराया?

धृतराष्ट्र के इसी पक्षपाती भाव के कारण दुर्योधन को रोकने वाला कोई नहीं था। दुर्योधन ने:

  • भीम को विष खिलाकर जल में फेंक दिया।
  • पाण्डवों को लाक्षागृह में जलाने का प्रयास किया।
  • युधिष्ठिर के साथ छलपूर्वक जुआ खेला।
  • पाण्डवों का नाश करने के लिए सेना लेकर वन तक चला गया।

लेकिन धृतराष्ट्र ने उसे कभी नहीं रोका। क्यों? क्योंकि उनके भीतर यह भाव था — "अगर किसी तरह पाण्डवों का नाश हो जाए, तो मेरे बेटों का राज्य सुरक्षित रहेगा।" और यही पक्षपात धीरे-धीरे पूरे कुल के विनाश की ओर ले गया।

इस श्लोक का सबसे सुंदर रहस्य – दही मंथन का उदाहरण

यहाँ एक बहुत सुंदर उदाहरण दिया गया है। जैसे दही को बिलोया जाता है, तो उसमें हलचल पैदा होती है, और उसी हलचल से मक्खन निकलता है।

ठीक उसी प्रकार — धृतराष्ट्र के मन में मौजूद "मामकाः" और "पाण्डवाः" के भेद ने एक बड़ी हलचल पैदा की। इस हलचल से युद्ध पैदा हुआ।

लेकिन दूसरी ओर, अर्जुन के मन में भी युद्धभूमि पर एक अलग प्रकार की हलचल पैदा हुई। जब अर्जुन ने अपने सामने अपने ही गुरुजनों, पितामहों, भाइयों, संबंधियों और प्रियजनों को देखा, तो उनके मन में कल्याण की अभिलाषा जागी। और उसी मानसिक हलचल से प्रकट हुआ — भगवद्गीता रूपी अमूल्य मक्खन।

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 का महत्व (Importance)

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 का महत्व केवल कथा के आरंभ तक सीमित नहीं है। यह श्लोक हमें बताता है कि पूरे महाभारत युद्ध की जड़ में मनुष्य का "अपने-पराये" का भेदभाव ही था। धृतराष्ट्र का यह एक प्रश्न — "मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत" — पूरे ग्रंथ के मूल भाव को खोल देता है।

यही श्लोक आगे चलकर संजय की दिव्य दृष्टि, अर्जुन के विषाद और अंततः श्रीकृष्ण के उपदेश की पृष्ठभूमि तैयार करता है। इसीलिए इसे गीता का द्वार-श्लोक भी कहा जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, यह श्लोक हमें यह भी सिखाता है कि किसी भी ग्रंथ, कथा या घटना को समझने के लिए उसकी पृष्ठभूमि जानना कितना आवश्यक है। बिना यह जाने कि युद्ध की भूमिका कैसे बनी, दुर्योधन की जिद क्या थी, माता कुन्ती का दुःख क्या था — हम गीता के आगे के अध्यायों में अर्जुन के मानसिक द्वंद्व को पूरी तरह अनुभव नहीं कर सकते। इसलिए Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 को गीता अध्ययन की नींव माना जाता है।

आज के जीवन में इस श्लोक की प्रासंगिकता

आज के समय में भी "मामकाः" और "पाण्डवाः" वाला भेदभाव हमारे आस-पास हर जगह दिखाई देता है — चाहे वह संयुक्त परिवार में सम्पत्ति का बँटवारा हो, कार्यस्थल पर पक्षपात हो, या समाज में "अपने" और "पराये" के आधार पर किया गया व्यवहार हो।

  • परिवार में — जब माता-पिता एक संतान का पक्ष लेकर दूसरी की उपेक्षा करते हैं, तो घर में वही कलह पैदा होती है जो धृतराष्ट्र के पक्षपात से हुई थी।
  • कार्यस्थल में — जब नेतृत्व निष्पक्ष निर्णय के बजाय "अपने लोगों" को बढ़ावा देता है, तो टीम में विश्वास टूटता है।
  • समाज में — जब हम जाति, सम्प्रदाय या क्षेत्र के आधार पर "अपने-पराये" का भेद करते हैं, तो वही कलह पैदा होती है जिसकी चेतावनी यह श्लोक हमें देता है।

इसलिए Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 Meaning केवल एक ऐतिहासिक कथा नहीं, बल्कि आज के पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन के लिए भी एक व्यावहारिक मार्गदर्शक है — निष्पक्षता, धर्म और सबके हित की भावना रखने की सीख।

आध्यात्मिक सीख – संक्षेप में

  • 🙏 धर्म को सामने रखकर ही हर कार्य करना चाहिए।
  • 🙏 अपने सुख से पहले सबके हित का ध्यान रखना चाहिए।
  • 🙏 "अपने और पराये" का भेदभाव कलह और विनाश को जन्म देता है।
  • 🙏 पक्षपात, चाहे परिवार में हो या समाज में, अंततः विनाशकारी सिद्ध होता है।
  • 🙏 मन की हलचल — यदि सही दिशा में हो — तो जीवन बदलने वाला ज्ञान भी दे सकती है, जैसे अर्जुन के मन की हलचल से गीता प्रकट हुई।

धृतराष्ट्र के मन की हलचल से लड़ाई पैदा हुई… और अर्जुन के मन की हलचल से गीता प्रकट हुई।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 किसने और किससे पूछा था?

यह प्रश्न राजा धृतराष्ट्र ने अपने मन्त्री और सारथी संजय से पूछा था, जब कुरुक्षेत्र में कौरव और पाण्डव सेनाएँ युद्ध के लिए एकत्र हुई थीं।

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 Meaning क्या है?

इस श्लोक का अर्थ है — "हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्र कौरव और पाण्डु के पुत्र पाण्डव — उन्होंने क्या किया?"

कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यों कहा जाता है?

क्योंकि यहाँ देवताओं ने यज्ञ किया था और राजा कुरु ने तपस्या की थी। यज्ञ और तपस्या जैसे धर्ममय कार्यों के कारण इसे "धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र" कहा गया।

धृतराष्ट्र ने "मामकाः" और "पाण्डवाः" शब्दों का प्रयोग क्यों किया?

धृतराष्ट्र के मन में द्वैधीभाव था — वे दुर्योधन आदि को अपने पुत्र मानते थे, जबकि युधिष्ठिर आदि को पाण्डु के पुत्र मानते थे, अपने नहीं। यही भेदभाव उनकी वाणी में झलकता है।

माता कुन्ती ने पाण्डवों को युद्ध की आज्ञा क्यों दी?

दो कारणों से — पहला, द्रौपदी के सभा में हुए अपमान से आहत होकर, और दूसरा, दुर्योधन आदि द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को बंदी बनाने के प्रयास से क्रोधित होकर, माता कुन्ती ने पाण्डवों को युद्ध के लिए आज्ञा दी।

Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 से हमें क्या शिक्षा मिलती है?

यह श्लोक सिखाता है कि जीवन में हर कार्य धर्म को सामने रखकर करना चाहिए, केवल अपने सुख के लिए नहीं बल्कि सबके हित के लिए, और "अपने-पराये" का भेदभाव नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे कलह पैदा होती है।

क्या युद्ध टाला जा सकता था?

हाँ। राजाओं ने बार-बार सन्धि का प्रस्ताव रखा और भगवान श्रीकृष्ण स्वयं शान्ति प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर गए, लेकिन दुर्योधन ने बिना युद्ध के सूई की नोक जितनी भूमि भी देने से इनकार कर दिया, जिस कारण युद्ध अनिवार्य हो गया।

निष्कर्ष

इसलिए कहा जा सकता है — धृतराष्ट्र के मन की हलचल से लड़ाई पैदा हुई, और अर्जुन के मन की हलचल से गीता प्रकट हुई। एक ओर था "मामकाः" — ये मेरे हैं, दूसरी ओर था "पाण्डवाः" — ये दूसरे हैं। और इसी भेदभाव ने महाभारत के युद्ध को जन्म दिया। लेकिन उसी युद्धभूमि में अर्जुन के मन में उठे प्रश्नों ने संसार को दिया — श्रीमद्भगवद्गीता।

यही है Bhagavad Gita Chapter 1 Shloka 1 की गहराई — धर्म को सामने रखकर कर्म करो, अपने-पराये के भेद से ऊपर उठो, और हर कार्य केवल अपने सुख के लिए नहीं, बल्कि सबके हित को ध्यान में रखकर करो।

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