Mokshada Ekadashi: जिस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया

Lord Krishna delivering the Bhagavad Gita to Arjuna on Mokshada Ekadashi, Geeta Jayanti divine moment on the Kurukshetra battlefield.

हरे कृष्णा। सृष्टि के इस अनादि प्रवाह में कुछ दिव्य तिथियाँ ऐसी होती हैं, जो आत्मा को उसके मूल स्त्रोत की ओर लौटने का सुनहरा अवसर प्रदान करती हैं। एकादशी ऐसी ही एक पावन तिथि है। प्रत्येक मास में आने वाली यह ग्यारहवीं तिथि केवल कैलेंडर का अंक नहीं, बल्कि चेतना के जागरण का प्रतीक है। जब मनुष्य इंद्रिय-तृप्ति के भँवर में खो जाता है, तब एकादशी उसे स्मरण दिलाती है कि जीवन केवल भोग का नहीं, बल्कि योग और भक्ति का पथ है। इस दिन किया जाने वाला उपवास केवल अन्न का त्याग नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म को संयमित करने की साधना है। यह तिथि हमें पुनः अपने भीतर झाँकने, आत्मा को उसकी दिव्यता से जोड़ने का माध्यम है।

इन्हीं अनेक पावन एकादशियों में से एक है मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi)। यह वह तिथि है जो केवल व्रत का दिन नहीं, बल्कि मोक्ष के द्वार खोलने वाली है। आइए, जानते हैं इस दिव्य तिथि का महत्व, कथा और इसके साथ जुड़े अद्भुत आध्यात्मिक रहस्य।

मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली ग्यारहवीं तिथि है। इसका नाम ही इसके महत्व को प्रकट करता है – ‘मोक्ष’ देने वाली। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से किया गया व्रत न केवल व्रती को, बल्कि उसके पितरों को भी मुक्ति प्रदान कर देता है। यह केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, बल्कि पितृ ऋण से मुक्ति एवं पारलौकिक कल्याण का सशक्त साधन है।

पौराणिक कथा एवं महत्व

बहुत समय पहले चंपकवन नामक नगर में वैखानस नाम के एक धर्मपरायण राजा राज्य करते थे। उनके राज्य में किसी प्रकार का पाप या अन्याय नहीं था। एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि उनका पिता नरक में कष्ट भोग रहा है। राजा इस दृश्य से अत्यंत दुखी हो गए।

सुबह होते ही वे उस पर्वत पर पहुँचे जहाँ महर्षि पार्वती-मंदिर के संरक्षक परम ज्ञानी परवत मुनि रहते थे। राजा ने मुनि से विनती की—“हे मुनि! कृपया बताएं मेरे पिता को इस दुखद अवस्था से कैसे छुटकारा मिले?”

मुनि ने ध्यान करके राजा के पिता की स्थिति देखी और कहा—राजन, आपके पिता ने पिछले जन्म में कुछ पापकर्म किए थे, जिसके कारण वे इस अवस्था में हैं। उनके उद्धार का एकमात्र उपाय है— आप पूरे नियम और श्रद्धा से मोक्षदा एकादशी का व्रत करें और उसका पुण्य उन्हें अर्पित करें।”

राजा ने मुनि के निर्देशों के अनुसार उपवास किया, भगवान विष्णु का पूजन किया, दान-पुण्य किया और व्रत का फल अपने पिता को समर्पित कर दिया। व्रत पूर्ण होते ही एक दिव्य आकाशवाणी हुई—“राजन! तुम्हारे व्रत के पुण्य से तुम्हारे पिता नरक से मुक्त होकर स्वर्गलोक को चले गए हैं।

राजा ने प्रसन्न होकर मुनि एवं श्रीहरि को प्रणाम किया। तभी से यह एकादशी मनुष्य को मोक्ष, पितृ-उद्धार, और सभी पापों से मुक्ति देने वाली मानी जाती है।

मोक्षदा एकादशी और Gita Jayanti का पावन संगम

मोक्षदा एकादशी की दिव्यता यहीं समाप्त नहीं होती। इस दिन का सबसे महान आध्यात्मिक महत्त्व यह है कि—इसी पावन तिथि पर भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया।

जब कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरुआत होने वाली थी, अर्जुन मोह और दुःख से विचलित हो गए थे।
उन्होंने कहा—“हे कृष्ण! मैं अपने ही बंधु-बांधवों को कैसे मारूँ? मेरा मन युद्ध करने को तैयार नहीं है।”

तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें—

  • धर्म का स्वरूप,

  • आत्मा की अमरता,

  • भक्ति और समर्पण,

  • निष्काम कर्म,

  • और मोक्ष का मार्ग

अत्यंत सरल और दिव्य वचनों में समझाया। यही उपदेश आगे चलकर श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में विश्व को मार्गदर्शन देता है। इसी कारण मोक्षदा एकादशी को Gita Jayanti भी कहा जाता है।

निष्कर्ष

मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मोत्थान की सशक्त पुकार है। यह दिन हमें तीन महत्वपूर्ण शिक्षाएं देता है:

  1. व्रत का संयम: जो शरीर और मन को अनुशासित करता है।

  2. गीता का ज्ञान: जो कर्तव्य और धर्म का मार्ग दिखाता है।

  3. पितृ तर्पण की भावना: जो हमें स्वार्थ से ऊपर उठाकर सार्वभौमिक कल्याण के लिए प्रेरित करती है।

यह तिथि हमें समझाती है कि श्री कृष्ण की निकटता त्याग में है, सेवा में है और शुद्ध ज्ञान में है। आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी अपने भीतर के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से दूर करने का संकल्प लें।

आप सभी को मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) की हार्दिक शुभकामनाएं।
हरे कृष्णा।

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