महाभारत का वह अद्भुत वीर, जिन्हें आज संसार भर में khatu shyam के नाम से पूजा जाता है—उनकी कथा इतनी विलक्षण है कि सुनने वाला स्वयं ही भक्ति और आश्चर्य में डूब जाता है। Barbarik, घटोत्कच के तेजस्वी पुत्र, ऐसे महाबली थे जो अकेले ही कुछ ही पलों में महाभारत का पूरा युद्ध समाप्त कर सकते थे।
उनकी प्रतिज्ञा थी कि वे सदैव कमजोर पक्ष का साथ देंगे—और यही प्रतिज्ञा उन्हें धर्मयुद्ध के निर्णायक क्षण पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण से मिलाती है। जब Barbarik ने एक ही बाण से दोनों सेनाओं का परिणाम स्पष्ट कर दिया, तब श्रीकृष्ण समझ गए कि यदि वे रणभूमि में उतरे, तो युद्ध का संतुलन बदल जाएगा और धर्म की स्थापना संभव नहीं होगी।
धर्म की रक्षा हेतु कृष्ण ने उनसे उनका पवित्र शीश दान माँगा, और Barbarik ने दिव्य मुस्कान के साथ अपना अमर बलिदान दे दिया। उनके इस अतुलनीय त्याग से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने वरदान दिया कि कलयुग में वे श्याम के नाम से पूजित होंगे, और जो भक्त सच्चे मन से उन्हें स्मरण करेगा—उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी। इस प्रकार वीर Barbarik आज खाटूश्याम के रूप में भक्तों के हृदयों में विराजते हैं—त्याग, वीरता और भक्ति के अमर प्रतीक बनकर।
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Toggleपांडव, राजाओं की सभा और महायुद्ध का प्रथम संकेत
पाण्डवों का तेरहवाँ वनवास वर्ष पूरा हो गया और इसके बाद सभी राजा उपप्लव्य में एकत्र हुए। वे आगे आने वाले युद्ध की तैयारी में लगे थे और इसलिए पाण्डव भी कुरुक्षेत्र पहुँचे। उपप्लव्य वह नगर था जहाँ पांडवों ने अज्ञातवास पूरा करने के बाद अपना मुख्य कैंप/आधार-स्थल बनाया था। युद्ध से ठीक पहले पांडवों के सभी मित्र-राजा, सेनाएँ और सहयोगी सबसे पहले उपप्लव्य में ही इकट्ठे हुए थे।
उन्होंने वहाँ अपना शिविर स्थापित किया क्योंकि कौरव पहले से वहाँ डेरा डाले हुए थे। उनकी विशाल सेना पूरी तरह युद्ध के लिए तैयार थी। इसी समय पितामह भीष्म ने अपने पक्ष के रथियों और अतिरथियों की विस्तृत गणना की। यह विवरण महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे दोनों पक्षों की शक्ति स्पष्ट होती थी। युधिष्ठिर को यह जानकारी गुप्तचरों से मिली और इसलिए उन्होंने तुरंत भगवान श्रीकृष्ण से वार्ता की। यह वार्ता सभी राजाओं की उपस्थिति में हुई क्योंकि विषय अत्यंत गंभीर था।
महाभारत युद्ध से पहले की सबसे महत्वपूर्ण चर्चा
उन्होंने कहा कि पितामह ने अपनी सेना का वर्णन किया है और दुर्योधन ने उस विवरण को सुनकर अपने महारथियों से एक कठिन प्रश्न किया है। उसने पूछा कि कौन योद्धा पाण्डवों को उनकी सेना सहित जल्द पराजित कर सकता है। यह प्रश्न उसकी चिंता को स्पष्ट दिखाता था। भीष्म ने उत्तर में कहा कि वे एक मास में यह कार्य कर सकते हैं और कृपाचार्य ने भी यही अवधि बताई। इसके बाद द्रोणाचार्य ने पन्द्रह दिनों की अवधि बताई और अश्वत्थामा ने दस दिनों की घोषणा की।
अंत में कर्ण ने कहा कि वह छह दिनों में पाण्डवों को उनकी सेना सहित नष्ट कर सकता है। उसका उत्तर सबसे तीव्र और साहसपूर्ण था। युधिष्ठिर ने यह सभी उत्तर शांत मन से सुने और इसके बाद उन्होंने वही प्रश्न अपने पक्ष में रखा ताकि उनके योद्धाओं का संकल्प स्पष्ट हो सके। उन्होंने शांत स्वर में पूछा कि बताएँ कौन योद्धा कौरवों को उनकी सेना सहित पराजित कर सकता है।
पांडव सेना की शक्ति का स्पष्ट आश्वासन
राजा युधिष्ठिर की बात सुनकर अर्जुन सम्मानपूर्वक बोले कि भीष्म और अन्य महारथियों की प्रतिज्ञाएँ असंगत लगती हैं, क्योंकि विजय और पराजय का निश्चय पहले से तय नहीं किया जा सकता। इसके बाद अर्जुन ने कहा कि पांडवों के वीर राजा युद्ध के लिए तैयार हैं और वे पूरी शक्ति से रणभूमि में डटे हुए हैं। इसलिए उन्होंने समझाया कि द्रुपद, विराट, कैकेय, सहदेव, सात्यकि, चेकितान, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच और भीमसेन जैसे योद्धा अत्यंत पराक्रमी हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि भगवान श्रीकृष्ण कभी किसी से परास्त नहीं हुए और उनका साथ पांडवों की सबसे बड़ी शक्ति है। फिर उन्होंने कहा कि इन महान योद्धाओं में से एक योद्धा भी कौरव सेना का विनाश कर सकता है। अतः अर्जुन ने कहा कि कौरव इनकी शक्ति से वैसे ही भागेंगे जैसे सिंह से डरे मृग। अंत में अर्जुन ने स्पष्ट कहा कि यदि युधिष्ठिर को और शांति चाहिए तो वे जान लें कि अर्जुन अकेले भी एक दिन में समस्त कौरवों को पराजित कर सकते हैं।
Barbarik का दिव्य पराक्रम
अर्जुन की बात सुनकर घटोत्कच के पुत्र Barbarik मुस्कुराए और कहा कि अर्जुन की प्रतिज्ञा उन्हें उचित नहीं लगती, क्योंकि ऐसी बात दूसरों के पराक्रम को कम करती है। इसलिए उन्होंने आग्रह किया कि अर्जुन और श्रीकृष्ण सहित सभी योद्धा मौन रहें, क्योंकि वे एक मुहूर्त में भीष्म और अन्य महारथियों को पराजित कर सकते हैं। इसके बाद उन्होंने कहा कि उनका दिव्य धनुष अत्यंत भयंकर है और उनके पास सिद्धायुक्त दो अक्षय तूणीर भी हैं।
उन्होंने बताया कि भगवती सिद्धाम्बिका ने उन्हें एक दिव्य खड्ग दिया है जो हर युद्ध में अपराजेय रहता है। इसी कारण वे इतने आत्मविश्वास से विजय की घोषणा करते हैं। उनकी यह बात सुनकर सभी क्षत्रिय आश्चर्य में पड़ गए और अर्जुन भी आक्षेप करने पर लज्जित होकर श्रीकृष्ण की ओर देखने लगे। तब श्रीकृष्ण ने कहा कि Barbarik ने अपनी असाधारण शक्ति के अनुसार ही यह बात कही है और इसके पराक्रम की अद्भुत कथाएँ प्रचलित हैं। उन्होंने यह भी बताया कि बर्बरीक ने पूर्वकाल में पाताल जाकर नौ करोड़ पलाशी दैत्यों का संहार क्षणभर में किया था।
कृष्ण के प्रश्न और Barbarik की अद्भुत शक्ति का प्रदर्शन
श्रीकृष्ण ने घटोत्कच के पुत्र Barbarik से पूछा —“बेटा, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, कर्ण और दुर्योधन जैसे महान योद्धाओं से घिरी कौरव सेना को तुम इतने जल्दी कैसे मार सकते हो? तुम्हारे पास कौन-सी विशेष शक्ति है?”
जब भगवान ने ऐसा पूछा, तब सिंह जैसी छाती, पहाड़ जैसा शरीर और अद्भुत बल वाले Barbarik ने तुरंत अपना धनुष उठाया। उसने एक बाण लगाया और उसमें लाल भस्म भरकर कान तक खींचकर छोड़ दिया।
बाण के उड़ते ही उसके आगे से निकलने वाली भस्म दोनों सेनाओं के सैनिकों के मर्मस्थलों (कमज़ोर और मृत्यु देने वाले बिंदुओं) पर जाकर गिरी।
लेकिन पाँच पांडव, कृपाचार्य और अश्वत्थामा उस भस्म के प्रभाव से बिल्कुल प्रभावित नहीं हुए।
यह सब करके Barbarik ने सबके सामने कहा —“आप सबने देख लिया। इस क्रिया से मैंने यह जान लिया कि युद्ध में कौन-कौन वीर कहाँ-कहाँ से मारे जाएँगे। अब मैं देवी के दिए हुए तेज और अचूक बाण उन्हीं मर्मस्थलों पर मारूँगा। इससे सब योद्धा पल भर में मर जाएँगे।
आप सभी अपने धर्म की कसम खाकर वादा करें कि किसी भी हालत में हथियार नहीं उठाएँगे।
मैं अकेला ही बस दो घड़ी में पूरी शत्रु सेना का अंत कर दूँगा।”
Barbarik का वध
जब Barbarik (बर्बरीक) ने दिखाया कि वह अकेले ही पूरी कौरव सेना को बहुत जल्दी खत्म कर सकता है, तो सब लोग उसकी शक्ति देखकर हैरान रह गए और उसकी खूब प्रशंसा करने लगे। लेकिन उसी समय श्रीकृष्ण क्रोधित हो उठे, क्योंकि Barbarik की यह असीम शक्ति महाभारत के धर्मयुद्ध का संतुलन बिगाड़ देती। युद्ध का उद्देश्य धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश था, और यदि Barbarik अकेला ही पूरा युद्ध समाप्त कर देता, तो न धर्म की विजय सिद्ध होती, न युद्ध का वास्तविक परिणाम मिलता।
इसके साथ ही Barbarik को यह वरदान भी था कि वह हमेशा कमज़ोर पक्ष का साथ देगा—शुरुआत में पांडव कमज़ोर दिखते, तो वह उनकी ओर से लड़ता; लेकिन जैसे ही पांडव जीतने लगते, उसे कौरवों की ओर जाना पड़ता। इसका अर्थ यह था कि युद्ध कभी समाप्त ही नहीं होता। इसलिए धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि Barbarik का जीवित रहना असंभव है, और उन्होंने तुरंत अपना सुदर्शन चक्र चलाकर उसका वध कर दिया।
यह देखकर सब लोग स्तब्ध रह गए और एक-दूसरे से कहने लगे—“अहो! यह क्या हुआ? घटोत्कच का इतना वीर पुत्र कैसे मारा गया?” पांडव और सभी राजा दुःख से रोने लगे, और स्वयं घटोत्कच “हा पुत्र! हा पुत्र!” कहते हुए मूर्छित होकर गिर पड़ा। उसी समय सिद्धाम्बिका सहित चौदह देवियाँ वहाँ प्रकट हुईं। देवी चण्डिका ने घटोत्कच को सांत्वना दी और ऊँचे स्वर में कहा—“सब राजा सुनें। भगवान श्रीकृष्ण ने महाबली बर्बरीक का वध किस कारण किया है, यह मैं बताती हूँ।”
बर्बरीक की मृत्यु का असली कारण
देवी ने सब राजाओं से कहा कि वह बताएँगी कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाबली Barbarik का वध क्यों किया। बहुत समय पहले मेरु पर्वत के शिखर पर सभी देवता एकत्र हुए थे। उसी समय पृथ्वी वहाँ पहुँची और बोली कि दैत्यों और अधर्म के कारण उसका भार बहुत बढ़ गया है और अब वह इसे सहन नहीं कर पा रही। इसलिए उसने देवताओं से विनती की कि वे उसका भार कम करें।
पृथ्वी की विनती सुनकर ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से कहा कि केवल वे ही पृथ्वी का भार उतार सकते हैं और सभी देवता उनका साथ देंगे। भगवान विष्णु ने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।
तभी सूर्यवर्चा नाम के यक्षराज खड़े हुए और घमंड से बोले कि देवताओं को मनुष्यलोक में जन्म लेने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अकेले ही अवतार लेकर धरती के सभी दैत्यों का संहार कर देंगे।
उनकी यह बात सुनकर ब्रह्माजी क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा कि पृथ्वी का यह भारी बोझ सभी देवताओं के लिए भी कठिन है, और सूर्यवर्चा उसे अकेले करने योग्य बताना केवल उनका अहंकार है। ब्रह्माजी ने उन्हें शाप दिया कि जब पृथ्वी का भार उतारने के लिए महायुद्ध आरंभ होगा, तब श्रीकृष्ण उनके शरीर का विनाश करेंगे, और यह बात निश्चित है।
शाप सुनकर सूर्यवर्चा घबरा गए और उन्होंने भगवान विष्णु से विनती की कि यदि उनका मृत्यु-काल तय है, तो कम से कम उन्हें ऐसा दिव्य ज्ञान और बुद्धि मिल जाए जो हर कार्य को सिद्ध कर दे। भगवान विष्णु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करते हुए कहा कि देवियाँ उनके मस्तक की पूजा करेंगी और वे भविष्य में पूज्य हो जाएँगे।
Barbarik को क्यों छोड़ नहीं सकते थे श्रीकृष्ण?
समय आने पर सूर्यवर्चा मनुष्यलोक में जन्मे और वे ही घटोत्कच के पुत्र Barbarik बने। इसलिए जब Barbarik ने अपनी शक्ति के कारण सम्पूर्ण युद्ध का परिणाम एक क्षण में बदलने की क्षमता प्रदर्शित की, तब उनके भीतर वही सूर्यवर्चा का वचन और भाग्य सक्रिय था। शाप और वरदान दोनों के कारण उनका वध श्रीकृष्ण के हाथों होना निश्चित था।
इसलिए देवी ने सब राजाओं से कहा कि श्रीकृष्ण के इस कार्य में किसी प्रकार का दोष नहीं है, क्योंकि Barbarik का वध होना ईश्वरीय योजना का हिस्सा था और उसी से युद्ध का संतुलन बना रहा।
श्रीकृष्ण ने Barbarik के मस्तक को अमर क्यों बनाया
श्रीकृष्ण ने राजाओं से कहा कि देवी चण्डिका ने जो बताया है, वह बिल्कुल सत्य है। उन्होंने याद दिलाया कि देवताओं की सभा में उन्होंने सूर्यवर्चा (जो अगले जन्म में बर्बरीक बना) को यह वरदान दिया था कि उसका मस्तक देवियों द्वारा पूजित होगा। इसी वरदान को पूरा करने के लिए ही श्रीकृष्ण ने गुप्त क्षेत्र में Barbarik को देवी-आराधना के लिए नियुक्त किया था।
फिर श्रीकृष्ण ने देवी चण्डिका से कहा—“देवि! यह भक्त का मस्तक है, इसे अमृत से सींचो और राहु के सिर की तरह अमर बना दो।” देवी ने ऐसा ही किया। मस्तक जीवित होते ही श्रीकृष्ण को प्रणाम करता हुआ बोला—“मैं युद्ध देखना चाहता हूँ, कृपया मुझे अनुमति दें।”
तब श्रीकृष्ण ने गंभीर स्वर में कहा—“वत्स! जब तक पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य और नक्षत्र रहेंगे, तब तक तुम सबके द्वारा पूजित रहोगे। अब इस पर्वत की चोटी पर जाकर बैठो और वहीँ से पूरे युद्ध को देखो।” यह कहकर देवियाँ आकाश में विलीन हो गईं। Barbarik का शरीर नीचे भूमि पर था, जिसका विधि अनुसार संस्कार किया गया, लेकिन अमर मस्तक का कोई संस्कार नहीं किया गया। यही मस्तक आगे चलकर Khatu Shyam (खाटू श्याम) के रूप में पूजित हुआ।
युद्ध के बाद भीम और अर्जुन के बीच हुआ संवाद
इसके बाद कौरव और पांडव सेनाओं के बीच अठारह दिनों तक भयानक युद्ध चला। द्रोण, कर्ण और सभी प्रमुख योद्धा मारे गए, और अंत में दुर्योधन भी पराजित होकर मारा गया। युद्ध समाप्त होने पर युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करके कहा—“हे प्रभु! इस विशाल युद्ध से हमें पार कराने वाले आप ही हैं। हम आपकी कृपा से विजयी हुए हैं।”
यह बात सुनकर सरल-स्वभाव वाले भीमसेन को बुरा लगा। उन्होंने कहा—“राजन्! धृतराष्ट्र के पुत्रों को तो मैंने मारा है। फिर आप हमारे पराक्रम को छोड़कर केवल कृष्ण की स्तुति क्यों कर रहे हैं?” भीम की यह बात अर्जुन को सहन नहीं हुई। अर्जुन ने कहा—“भैया भीम! ऐसा मत कहिए। आप श्रीकृष्ण को वास्तव में नहीं जानते। शत्रुओं का वध न आपके हाथों से हुआ, न मेरे हाथों से, न किसी अन्य वीर के हाथों से। युद्ध के समय मैं बार-बार देखता था कि मेरे आगे-आगे एक अदृश्य पुरुष चलता था और शत्रुओं को मारता जाता था। मुझे नहीं पता वह कौन था।”
भीम और अर्जुन का भ्रम — और बर्बरीक से सच्चाई
युद्ध खत्म होने के बाद अर्जुन ने कहा कि असली विजय श्रीकृष्ण की कृपा से मिली। यह सुनकर भीम नाराज़ हो गए। उन्हें लगा कि उन्होंने, अर्जुन ने और बाकी योद्धाओं ने लड़ाई जीती है — तो फिर पूरा श्रेय कृष्ण को क्यों?
अर्जुन ने कहा कि युद्ध के समय वह हमेशा आगे-आगे एक अद्भुत व्यक्ति को देखता था, जो शत्रुओं को मार रहा था, पर उसे पता नहीं था वह कौन है। भीम को यह बात मान्य न हुई।
तब भीम बोले–– “अगर तुम्हें ऐसा लगा तो चलो, बर्बरीक के मस्तक से पूछते हैं। उसने युद्ध पूरा देखा है।”
दोनों पर्वत पर गए और भीम ने पूछा–– “Barbarik, बताओ कुरुओं को किसने मारा?”
Barbarik ने जवाब दिया––
“मैंने पूरे युद्ध में सिर्फ एक ही पुरुष को लड़ते देखा।
उस पुरुष की बाईं ओर पाँच सिर और दस हाथ थे (रूप शिवजी का)।
दाहिनी ओर एक सिर और चार भुजाएँ थीं (रूप श्रीकृष्ण/विष्णु का)।
बाईं ओर उसने भस्म लगाई हुई थी, दाहिनी ओर चंदन।
बाईं ओर जटा, दाहिनी ओर मुकुट।
बाईं ओर चंद्रमा, दाहिनी ओर कौस्तुभमणि।
उस एक ही दिव्य पुरुष ने संपूर्ण कौरव सेना का विनाश किया। मैंने किसी और को युद्ध करते नहीं देखा।”
इतना सुनते ही आसमान चमक उठा, फूल बरसने लगे, स्वर्गीय ध्वनियाँ होने लगीं कि “साधु-साधु।”
भीम को समझ आया कि असली युद्धकर्ता श्रीकृष्ण ही थे, वे लज्जित हो गए और मन से पश्चाताप किया।
भीम ने श्रीकृष्ण से क्षमा माँगी। कृष्ण ने हँसकर कहा–– “सब क्षमा किया।”
बर्बरीक का आशीर्वाद, कृष्ण का वचन और इस कथा का फल
इसके बाद श्रीकृष्ण Barbarik के पास गए और कहा–“तुम इस पवित्र क्षेत्र को न छोड़ना। यदि हमसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा करना।”
Barbarik ने प्रणाम किया और अपने इच्छित स्थान को चले गए। श्रीकृष्ण ने भी अपना अवतार-कार्य पूर्ण कर परमधाम की यात्रा की।
फिर ऋषि आगे बताते हैं कि उन्होंने Barbarik का जन्म, उसका वध, उसका वरदान और इस गुप्तक्षेत्र का महत्व बता दिया है। ब्रह्माजी ने इस क्षेत्र की सीमा सात कोस बताई है और कहा है कि यह सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाला स्थान है। Khatu Shyam Ji Temple आज भी इस महान बलिदान की स्मृति को जीवित रखता है, और लाखों भक्त वहाँ पहुँचकर अनंत शांति का अनुभव करते हैं।
फिर इस कथा के फल बताए जाते हैं:
जो इस प्रसंग को सुनता या पढ़ता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं।
यह कथा बहुत पवित्र, पुण्यदायक और यश देने वाली है।
मृत्यु के बाद इस कथा के श्रवण से मनुष्य भगवान शिव के धाम को जाता है।
जो व्यक्ति इसे प्रतिदिन भक्ति और संयम के साथ सुनता है, वह अंत में सूर्यलोक के पार विष्णु के परमधाम को प्राप्त होता है।
Khatu Shyam Ji Temple Route: आसान यात्रा मार्ग
स्थान: खाटू गाँव, सीकर ज़िला (Rajasthan)
सबसे नज़दीकी बड़ा शहर: जयपुर
दूरी: जयपुर से लगभग 80–85 km
रूट:
Jaipur → Chomu → Ringas → Khatu Shyam Ji Mandir
(सीधा, आसान और 2 घंटे का मार्ग)
यदि कोई दिल्ली से जाना चाहे:
Delhi → Neemrana → Kotputli → Khetri → Reengus → Khatu
(लगभग 270–280 km, 5–6 घंटे)
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